लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी
मृत्यु — एक अंत नहीं, एक रूपांतरण
सनातन धर्म का पहला और अंतिम सत्य है — मृत्यु अनिवार्य है।
परंतु मृत्यु को केवल अंत मानना, उसके वास्तविक स्वरूप को नकारना है।
वेद, उपनिषद और गीता हमें बताते हैं — मृत्यु केवल शरीर का त्याग है, आत्मा का नहीं।
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।” (गीता 2.23)
यह शाश्वत आत्मा का यात्रा-स्थल परिवर्तन है — एक देह से दूसरी अवस्था में।
अंतिम संस्कार की विधियाँ — परंपरा नहीं, विज्ञान
अक्सर लोग अंतिम संस्कार को केवल धार्मिक अनुष्ठान मानते हैं,
परंतु इनके पीछे गहरे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं।
अग्नि-संस्कार (दाह संस्कार)
वैज्ञानिक पहलू उच्च तापमान में शरीर का दहन संक्रमण और अशुद्धि को समाप्त करता है।
आध्यात्मिक पहलू: अग्नि को पवित्रता का प्रतीक माना गया है — यह पंचमहाभूतों में से एक है, जो शरीर को उसके मूल तत्त्वों में लौटा देता है।
अस्थि-विशर्जन
वैज्ञानिक पहलू: प्रवाहित जल में अस्थियाँ घुलकर मिट्टी और खनिज में मिल जाती हैं, जिससे जल और पर्यावरण में शुद्धि बनी रहती है।
आध्यात्मिक पहलू नदियाँ, विशेषकर गंगा, मोक्षदायिनी मानी जाती हैं — यह आत्मा की अगली यात्रा के लिए शांति का प्रतीक है।
श्राद्ध और पिंडदान
वैज्ञानिक पहलू: सामूहिक भोजन और अन्नदान समाज में सहयोग और एकता को मजबूत करते हैं।
आध्यात्मिक पहलू यह कृतज्ञता का भाव है — पूर्वजों के प्रति स्मरण और सम्मान।
संस्कार — जीवन की दिशा और मृत्यु का सम्मान
सनातन संस्कृति में संस्कार केवल जन्म या विवाह तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मृत्यु तक चलते हैं।
इनका उद्देश्य है —
जीवन को पवित्र बनाना
मृत्यु को गरिमा देना
आत्मा की यात्रा में सहायक बनना
अंतिम संस्कार वह बिंदु है जहाँ परिवार का भावनात्मक संतुलन और आत्मा की आध्यात्मिक मुक्ति एक साथ साधी जाती है।
आधुनिकता और परंपरा का संतुलन
आज शहरी जीवन में समय, स्थान और संसाधनों की कमी है।
इसी कारण इलेक्ट्रिक क्रिमेटोरियम, पर्यावरण-हितैषी लकड़ी, और संस्कार सेवाओं का पेशेवर प्रबंधन जैसी नई पहलें आ रही हैं।
मगर इनके बीच विधियों का सार और आध्यात्मिक उद्देश्य खोना नहीं चाहिए।
सनातन विज्ञान की प्रासंगिकता
मृत्यु के संस्कार केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान और प्रकृति-विज्ञान के अद्भुत मेल हैं।
यह शोक को स्वीकारने और मुक्त करने का सामूहिक तरीका है।
यह पर्यावरणीय संतुलन और स्वास्थ्य सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित है।
यह हमें अनित्यता का बोध और कर्तव्य का स्मरण कराता है।
मृत्यु से मोक्ष तक
“संस्कार केवल देह को विदा करने का नहीं, आत्मा को आगे बढ़ाने का माध्यम है।”
अंतिम संस्कार हमें सिखाता है — जीवन का अंत भी गरिमामय होना चाहिए, जैसे उसका आरंभ।
सनातन धर्म के ये संस्कार हमें यह याद दिलाते हैं कि मृत्यु अंत नहीं, एक और यात्रा की शुरुआत है।









































