लोक टुडे के लिए आश्चर्य तिवारी की रिपोर्ट
“Gen Z मंदिर नहीं जाती, लेकिन ध्यान करती है।
वह पूजा नहीं करती, लेकिन ऊर्जा को महसूस करती है।
वह प्रवचन नहीं सुनती, लेकिन जीवन का अर्थ तलाशती है।
तो क्या वह आस्तिक है?”
यह प्रश्न आज की सामाजिक और सांस्कृतिक बहसों का केंद्र बन चुका है कि Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी वास्तव में ईश्वर में विश्वास रखती है या नहीं। क्या यह पीढ़ी धर्म से कट चुकी है, या फिर उसने आस्तिकता की नई परिभाषा गढ़ी है?
परंपरागत धर्म से दूर, पर आध्यात्मिकता के करीब

Gen Z धार्मिक कर्मकांडों से उतनी जुड़ी नहीं है जितनी उनकी पूर्ववर्ती पीढ़ियाँ थीं। यह पीढ़ी अपने सवालों के जवाब ईश्वर से नहीं, स्वयं की चेतना से मांगती है। जहां Baby Boomers मंदिर और मस्जिद को ईश्वर का घर मानते थे, वहीं Gen Z उसे एक अनुभव मानती है — “A felt presence, not a prescribed form.”
डिजिटल युग की आस्तिकता — App में भजन, Reel में ध्यान
Gen Z का ईश्वर इंस्टाग्राम पर #SpiritualAwakening टैग में छुपा है।
वह यूट्यूब पर ‘Guided Meditation’ सुनते हैं, Spotify पर ‘Morning Mantras’ चलाते हैं।
वाला ब्रह्म चाहिए।
‘हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन धर्मों पर नहीं’
Gen Z का सबसे बड़ा टकराव संगठित धर्मों (Organized Religions) से है —
जो जाति, लिंग, वर्जनाओं और पाखंड के प्रतीक बन चुके हैं।
वह पंडित या मौलवी से नहीं, कर्म और करुणा से प्रभावित होते हैं।
Gen Z पूछती है:
“अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो वह मंदिर की दानपेटी में सीमित क्यों है?”
आध्यात्मिकता बनाम धार्मिकता
आज का युवा ‘Sanatan Consciousness’ की बात करता है, धर्म के ठेकेदारों की नहीं।
वह Adiyogi से आकर्षित है लेकिन परशुराम की हिंसा से नहीं।
उसे रूमी, कबीर, बुद्ध जैसे मार्गदर्शक पसंद हैं जो सवालों को आमंत्रण देते हैं, डर नहीं।
वैज्ञानिक सोच और ईश्वर — विरोध नहीं, संवाद
Gen Z विज्ञान और तर्क को ईश्वर का विरोधी नहीं मानती।
बल्कि उनका मानना है कि “Universe is mathematically divine.”
CERN का God Particle हो या
NASA का Cosmic Web Visualization —
उनके लिए ईश्वर का अस्तित्व Quantum field में vibing energy की तरह है।
सर्वेक्षण क्या कहते हैं?
“क्या Gen Z आस्तिक है? — एक नई पीढ़ी की ईश्वर से अनूठी बातचीत”



















































