वैदिक दृष्टिकोण से “गुरु पूर्णिमा” का महत्व

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वैदिक दृष्टिकोण से “गुरु पूर्णिमा” का महत्व
— पूज्य गुरुदेव श्री इंद्रमणि जी महाराज के चरणों में समर्पित-  हेमराज तिवारी

लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

गुरु पूर्णिमा क्या है?

गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह दिन महर्षि वेदव्यास जी की जयंती के रूप में भी प्रतिष्ठित है, जिन्होंने वेदों का विभाजन कर चार वेद बनाए और अनेक पुराणों व महाभारत की रचना की। इस दिन को “ज्ञान की पूजा”, “ब्रह्मविद्या की आराधना”, और “गुरुत्व के स्मरण” का पर्व माना गया है।

गुरु का वैदिक स्वरूप – वेदों में गुरु का महत्व

श्लोक 1:
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु: साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
(गुरु गीता)
अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, वही विष्णु हैं, वही महेश हैं। गुरु साक्षात परब्रह्म हैं — उनको प्रणाम है।

श्लोक 2:
“अचिन्त्यं अव्यक्तं अनन्तरूपं
गुरुं नमामि पुरुषं महान्तम्॥”
(यजुर्वेद उपनिषद)

गुरु वह तत्व हैं जो अव्यक्त होते हुए भी सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकाशित करते हैं। वे ही परम पुरुष हैं।

मनुष्य के जीवन में गुरु का स्थान

1. ज्ञान का उद्घाटनकर्ता:
गुरु वह दीपक हैं जो अज्ञान के अंधकार को काटकर आत्मज्ञान की रोशनी फैलाते हैं।

2. धार्मिक दिशा-दर्शक:
गुरु शिष्य को धर्म, कर्म, और मोक्ष का मार्ग बताते हैं — जिससे जीवन सार्थक होता है।

3. चेतना का संवाहक:
गुरु केवल बाह्य ज्ञान नहीं, अंतरात्मा को भी जागृत करते हैं।

4. मूल्यों का संचारक:
सत्य, संयम, सेवा, श्रद्धा – ये सभी गुण गुरु से प्राप्त होते हैं।

गुरु पूर्णिमा का मनाने का अर्थ और उद्देश्य:

गुरु को पुष्प अर्पित करना श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक
चरण वंदना ज्ञान के प्रति नम्रता
प्रवचन/सत्संग शास्त्र और वेदांत का श्रवण
ब्रह्मचर्य व्रत इंद्रिय संयम और आत्मनियंत्रण

वैदिक उपदेश:

✨ श्लोक 3:
“उपसन्नाय शिष्याय ब्रह्मविद्या प्रदीयते”
(छांदोग्य उपनिषद् 6.14.2)

जो विनम्रता और श्रद्धा से गुरु के समीप आता है, उसे ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
श्लोक 4:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”
(भगवद्गीता 4.38)

इस संसार में ज्ञान के समान कोई भी पवित्र वस्तु नहीं है — और यह ज्ञान गुरु से ही प्राप्त होता है।

पूज्य गुरुजी श्री इंद्रमणि जी महाराज के विचारों से “गुरु वह नहीं जो केवल उपदेश दे, बल्कि जो आपके भीतर का देवता जगा दे।
गुरु वह नहीं जो आपको दुनिया दिखाए, बल्कि जो आत्मा का दर्शन कराए।
गुरु वही जो आपको आपसे मिला दे।”

गुरु पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि, बोध, और समर्पण का एक पावन अवसर है। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य यदि केवल शरीर है तो सीमित है, लेकिन यदि गुरु से जुड़ा है तो असीम है।

पूज्य गुरुदेव श्री इंद्रमणि जी महाराज के श्रीचरणों में कोटिशः वंदन।
गुरु पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर हम सबमें आत्मज्ञान, समर्पण और सेवा का भाव उदित हो।”


kal subah ke liye

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