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Review by Hemraj
फिल्म रिव्यू: टाइगर ऑफ राजस्थान – एक बग़ावत, जो बंदूक से नहीं विचारों से गूंज उठी
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5)
श्रेणी: बायोपिक, एक्शन-ड्रामा
निर्देशक: अरविंद वाघेला
मुख्य भूमिका: [अरविंद वाघेला]
“टाइगर ऑफ राजस्थान” एक धारदार और भावनात्मक बायोपिक है, जो राजस्थान के कुख्यात लेकिन करिश्माई गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की कहानी को पर्दे पर उतारती है। यह फिल्म सिर्फ एक अपराधी की यात्रा नहीं है — यह एक सिस्टम से टकराने वाले इंसान की गाथा है, जो समाज के ठहरे हुए पानी में पत्थर बनकर उभरा।
कहानी और प्रस्तुति
फिल्म की कहानी एक सीधे-साधे, पढ़े-लिखे युवक आनंदपाल की है, जो शिक्षक बनना चाहता था लेकिन हालात और सिस्टम की धक्कामुक्की ने उसे बंदूक उठाने पर मजबूर कर दिया।
फिल्म सवाल उठाती है:
क्या आनंदपाल अपराधी था, या व्यवस्था का शिकार?
क्या उसने रास्ता चुना, या रास्ते ने उसे धकेला?
फिल्म में जेल से भागने, एनकाउंटर और उसकी मौत तक की यात्रा को दमदार तरीके से दिखाया गया है।
अभिनय
मुख्य अभिनेता ने आनंदपाल के किरदार में जान डाल दी है। उनका व्यक्तित्व कभी शांत विद्रोही लगता है, तो कभी आक्रोशित क्रांतिकारी। संवाद, हाव-भाव और आँखों की भाषा — सबमें गहराई है।
सहायक भूमिकाओं ने भी कहानी को मजबूत किया है, खासकर पुलिस अधिकारियों और राजनीतिक किरदारों ने।
निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी
राजस्थान के धूलभरे मैदान, वीरान हवेलियाँ और प्रदर्शनकारी जनसैलाब कैमरे में बेहद शानदार तरीके से कैद किए गए हैं। निर्देशन ऐसा है कि न आनंदपाल को देवता बनाया गया है, न शैतान — बस एक इंसान के रूप में दिखाया गया है, जो हालात से लड़ रहा है।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर
फिल्म का संगीत साधारण है, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर बेहद प्रभावशाली है — खासतौर पर एनकाउंटर और कोर्टरूम सीन्स में। राजस्थानी लोक धुनों की झलक भी फिल्म को स्थानीय रंग देती है।
क्या अच्छा है
सशक्त और साहसिक कहानी
गहराई से लिखा गया किरदार
रियलिस्टिक एक्शन
सामाजिक-राजनीतिक संदेश
क्या कमज़ोर है
कुछ जगहों पर आनंदपाल को थोड़ा ज़्यादा महिमामंडित किया गया
पारिवारिक पक्ष को थोड़ा और गहराई मिल सकती थी
अंत में आम जनता के विद्रोह को और विस्तार मिल सकता था
“टाइगर ऑफ राजस्थान” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक आवाज़ है। यह फिल्म आपको सोचने पर मजबूर करती है — कि नायक और खलनायक के बीच की रेखा कितनी धुंधली होती है। आनंदपाल चाहे जो भी था, उसकी कहानी सिनेमा पर लाने की हिम्मत काबिल-ए-तारीफ है।
देखिए — आनंद के लिए नहीं, सवालों के लिए।













































