लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान में नगरीय प्रशासन के पुनर्गठन की प्रक्रिया इस समय राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श का केंद्र बनी हुई है। राज्य सरकार की मंशा 2025 में सभी नगरीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की है, लेकिन यह उद्देश्य न केवल व्यवहारिक बाधाओं से घिरा है, बल्कि इससे राजनीतिक आशंकाएं भी उत्पन्न हो रही हैं। यह संपादकीय विश्लेषण इस जटिल मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को सामने रखने का प्रयास करता है।
परिसीमन की आवश्यकता या सत्ता का पुनरुद्धार?
राज्य सरकार के अनुसार, जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे महानगरों में दो नगर निगमों को पुनः एकीकृत कर ‘प्रशासनिक कुशलता’ और ‘भ्रष्टाचार पर अंकुश’ के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है। यह तर्क, नीति-निर्माण के स्तर पर तर्कसंगत प्रतीत होता है। परंतु यदि इस निर्णय को पिछले वर्षों की राजनीतिक हलचलों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह स्पष्ट है कि नगर निकायों का दोहरीकरण (अर्थात एक शहर में दो नगर निगम) पूर्ववर्ती सरकार के दौरान राजनीतिक रूप से प्रेरित था। अब पुनर्गठन भी उसी राजनीतिक प्रक्रिया की पुनरावृत्ति बनता दिख रहा है।
कानूनी पेंच: केंद्र-राज्य टकराव
सबसे बड़ी अड़चन केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई वह अधिसूचना है, जिसके तहत 1 जुलाई 2024 से प्रशासनिक सीमाओं में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने इस रोक को हटाने की मांग की है, लेकिन यदि यह बाधा बनी रहती है, तो परिसीमन की पूरी प्रक्रिया ही असंवैधानिक ठहर सकती है। यह टकराव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि भारतीय संघीय ढांचे में राज्य की स्वायत्तता बनाम केंद्र की नियंत्रण शक्ति की एक और मिसाल है।
राजनीतिक उद्देश्य और विरोध
कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का आरोप है कि यह पुनर्गठन ‘भाजपा-शासित नगर निगमों को भंग कर सत्ता में आने की साज़िश’ है। वहीं सत्तारूढ़ भाजपा इसे प्रशासनिक सुधार बता रही है। दुर्भाग्यवश, इस प्रक्रिया में जनता, निगम कर्मचारी और शहरी सेवाएं हाशिए पर हैं। क्या परिसीमन की इस कवायद में जनता की जरूरतें, उनकी भागीदारी और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी गई है? जवाब अस्पष्ट है।
‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ की व्यवहारिकता पर प्रश्न
राज्य सरकार का दावा है कि यदि सभी निकायों के कार्यकाल समाप्त होते ही प्रशासक नियुक्त कर दिए जाएं और पुनर्गठन/परिसीमन का कार्य 2025 की शुरुआत तक पूर्ण कर लिया जाए, तो नवंबर 2025 तक सभी चुनाव एक साथ कराना संभव है। लेकिन क्या इतनी जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया — जो तकनीकी, कानूनी और राजनीतिक टकरावों से जूझ रही है — इतने सीमित समय में पूरी हो सकती है? यह एक बड़ा प्रश्न है, और इस पर अभी तक किसी स्वतंत्र निकाय या विशेषज्ञ समिति की राय सामने नहीं आई है।
लोकतांत्रिक पारदर्शिता बनाम राजनीतिक तत्परता
राजस्थान में परिसीमन और पुनर्गठन का मुद्दा केवल चुनावों की समयसारिणी या प्रशासकीय दक्षता का नहीं है; यह स्थानीय स्वशासन की आत्मा, संवैधानिक विवेक और लोकतांत्रिक भागीदारी की परीक्षा है। यदि यह प्रक्रिया राजनीतिक त्वरितता के बजाय दीर्घकालिक संस्थागत मजबूती के उद्देश्य से हो, तो यह न केवल सफल होगी बल्कि राजस्थान के शहरी प्रशासन को एक नया मॉडल दे सकती है। लेकिन यदि यही प्रक्रिया जनता की अनदेखी, कानूनी खामियों और राजनीतिक स्वार्थों के चलते आगे बढ़ती है, तो यह “एक साथ चुनाव” का सपना, एक अधूरी कल्पना ही रह जाएगा।










































