दौसा की जाजम पर उम्मीदों का गठजोड़: क्या राजस्थान में कांग्रेस का नया सवेरा?

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हेमराज   टिकम चंद   वरिष्ठ पत्रकार

राजेश पायलट की 25वीं पुण्यतिथि पर दौसा की धरती एक बार फिर इतिहास की साक्षी बनी। यह केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं थी, यह कांग्रेस की आत्मा से निकली एक पुकार थी — अपने बिखरे कुनबे को फिर से एक सूत्र में पिरोने की कोशिश।

राजनीति में प्रतीक और मंच दोनों ही बहुत कुछ कहते हैं। जिस मंच पर कभी दरार की रेखाएं थीं, उसी मंच पर सचिन पायलट और अशोक गहलोत एक साथ बैठे — यह कोई साधारण दृश्य नहीं था। वर्षों की तल्ख़ियों, बयानों की कटुताओं, और सियासी तनावों के बाद दौसा में जो सियासी शांति संदेश फिज़ा में गूंजा, वह सिर्फ श्रद्धा का नहीं, बल्कि रणनीति का भी हिस्सा था।

सचिन का व्यक्तिगत न्योता: संदेशों से परे

इस आयोजन की सबसे अहम कड़ी रही — सचिन पायलट का अशोक गहलोत को व्यक्तिगत आमंत्रण। राजस्थान की राजनीति में यह कदम दिल और दिमाग दोनों से उठाया गया प्रतीत होता है। एक ओर जहां ये पायलट की पारिवारिक परंपरा का सम्मान था, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के लिए अंदरूनी एकजुटता का गंभीर प्रयास भी।

सचिन पायलट ने जिस नम्रता और परिपक्वता से इस आयोजन का नेतृत्व किया, वह बताता है कि राजनीति में उम्र भले ही अनुभव से पीछे हो, लेकिन दृष्टिकोण और दृष्टि अगर सुलझी हो तो वह पार्टी को आगे ले जाने की ताकत रखती है।

गहलोत का जवाब: “हम दूर कब थे…”

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह वक्तव्य — “हम दूर कब थे, मोहब्बत बनी रहेगी” — न केवल राजेश पायलट के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह राजस्थान कांग्रेस की दो सबसे सशक्त धाराओं के बीच संभावित मेल का सार्वजनिक एलान भी माना जा सकता है। यह बात स्वीकार करनी होगी कि पिछले कुछ वर्षों में गहलोत-पायलट खेमों की खींचतान ने राजस्थान में कांग्रेस की साख को आघात पहुँचाया है। लेकिन अब जबकि चुनावी चुनौतियाँ सामने हैं, पार्टी की पहली जरूरत है — आत्ममंथन और समन्वय।

भीड़ का संदेश: ये सिर्फ श्रद्धा नहीं, शक्ति थी

जिस तरह से देशभर से किसान, कांग्रेस कार्यकर्ता, और वरिष्ठ नेता दौसा पहुंचे वह कांग्रेस के लिए एक प्रकार का सांकेतिक शक्ति प्रदर्शन बन गया। यह आयोजन यह भी दर्शाता है कि राजेश पायलट की स्मृति में अब भी एक ऐसी अपील है जो जनभावना को आंदोलित करती है और पार्टी के भीतर ऊर्जा का संचार कर सकती है।

यह मेल है या सिर्फ मंचीय मेल?

राजनीतिक विश्लेषक इस एकता को लेकर संशय में हैं। क्या यह केवल आगामी चुनावों के मद्देनज़र ‘शो ऑफ यूनिटी’ है या वाकई पायलट-गहलोत के बीच अब राजनीतिक शांति स्थापित होने जा रही है? जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन एक बात स्पष्ट है — यदि यह मेल सिर्फ दिखावे का नहीं है, तो कांग्रेस राजस्थान में फिर से एक मजबूत लड़ाई लड़ सकती है।

राजेश पायलट की विरासत: आज भी जीवित प्रेरणा

राजेश पायलट का जीवन भारतीय राजनीति में संघर्षशीलता, सादगी और स्पष्टवादिता का प्रतीक रहा है। भारतीय वायुसेना से लेकर संसद और मंत्रालय तक उनका सफर प्रेरक रहा है। उनका जीवन आम जन के साथ खड़ा होने की मिसाल है। ऐसे नेता की पुण्यतिथि को सिर्फ स्मृति नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा तय करने का मंच बनाना — यह इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

दौसा की इस जाजम पर बैठी कांग्रेस सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं दे रही थी, वह भविष्य की पटकथा लिखने का प्रयास कर रही थी। अगर गहलोत और पायलट ईमानदारी से पुराने गिले भूलकर एक राह पर चलने को तैयार हों, तो यह कांग्रेस के लिए राजस्थान ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी एक नई ऊर्जा का स्रोत बन सकता है।

परंतु याद रहे — जुड़ाव की सबसे बड़ी परीक्षा समय लेता है, मंच नहीं।
अगर यह मेल केवल अवसरवादी मेल है तो जनता भी जल्द समझ लेगी। लेकिन यदि यह राजनीतिक परिपक्वता की शुरुआत है, तो दौसा का यह दिन आने वाले वर्षों में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा।

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