लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुलतावादी देश में “एक राष्ट्र, एक संविधान, एक कानून” की परिकल्पना केवल कानूनी व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की बुनियाद है। लेकिन जब किसी एक समुदाय के व्यक्ति को विशेष छूट या सहिष्णुता प्राप्त हो और वही कार्य अगर किसी दूसरे समुदाय द्वारा किया जाए तो उसका परिणाम उग्र प्रदर्शन, एफआईआर और यहां तक कि ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारों तक पहुंच जाए — तो यह सवाल उठाना लाज़मी हो जाता है कि क्या संविधान का पालन वास्तव में सबके लिए समान है?
हालिया ईद-उल-अज़हा पर अरफा खानम नामक अधिवक्ता और सोशल मीडिया व्यक्तित्व ने एक बालक और गाय की चित्रात्मक पोस्ट साझा की, जिसमें त्योहार की बधाई थी। यह पोस्ट एक सांप्रदायिक तनाव के बीज बो सकती थी क्योंकि गाय, विशेषकर भारत में, हिंदू समाज की धार्मिक आस्था का अत्यंत संवेदनशील प्रतीक है। जबकि यह पोस्ट देखने में सामान्य लग सकती है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि में इसे देखने पर प्रश्न उठते हैं।
यदि यही चित्र किसी हिंदू द्वारा मुस्लिम प्रतीकों के साथ साझा किया गया होता?
सोचिए, अगर कोई हिंदू व्यक्ति बकरीद के मौके पर किसी धार्मिक प्रतीक या जानवर के साथ तस्वीर साझा करता, और उसे इस्लामिक परंपराओं की आलोचना या संकेत में जोड़ देता — क्या तब भी समाज में शांति बनी रहती? क्या तब सोशल मीडिया पर मौन रहता? या फिर विरोध के स्वर और ‘ईमान खतरे में है’ जैसे नारे बुलंद होते?
मुस्लिम समाज और ‘सर तन से जुदा’ संस्कृति
पिछले वर्षों में हमने देखा है कि जब भी किसी मुस्लिम आस्था पर किसी ने छोटा सा भी सवाल उठाया, तो देशभर में हिंसा, दंगे और धार्मिक कट्टरता सामने आई। चाहे वो नुपुर शर्मा प्रकरण हो, या कन्हैया लाल की नृशंस हत्या — जब बात इस्लाम के प्रतीकों की आती है, तो अभिव्यक्ति की आज़ादी को धर्म की तलवार से कुचल दिया जाता है।
कानून का मौन या पक्षपात?
प्रश्न यह नहीं कि अरफा खानम को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया, बल्कि यह है कि क्या हमारे कानून में सभी के लिए समानता है या कुछ समुदाय विशेष कानून से ऊपर हैं? यदि यही कार्य किसी हिंदू नेता या कार्यकर्ता द्वारा किया गया होता, तो क्या पुलिस अब तक मुकदमा दर्ज न कर चुकी होती? क्या तथाकथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी चुप रहते?
संवेदनशीलता सबकी जिम्मेदारी है
हमें यह समझना होगा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार सभी को है, लेकिन उसकी एक सामाजिक, संवैधानिक और नैतिक मर्यादा भी है। धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी चीज़ों को सार्वजनिक मंच पर पोस्ट करते समय सभी समुदायों को संयम और संतुलन बरतना चाहिए। सरकार और न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी है कि वह समान रूप से सभी मामलों पर कार्रवाई करे, वरना लोगों के मन में “एक कानून सब पर लागू नहीं होता” जैसा संदेह पनपता रहेगा।
“कानून सबके लिए बराबर हो — तभी संविधान जीवित रह सकता है, वरना वह सिर्फ किताबों में ही रह जाएगा।”










































