लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
गंगधार/झालावाड़। गंगधार क्षेत्र में काला सोना कही जाने वाली अफीम की फसल इन दिनों अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुकी है। खेतों में अफीम के पौधों पर डोडे पकने लगे हैं और इसके साथ ही किसानों द्वारा पूजा-अर्चना का दौर भी शुरू हो गया है। यहां अफीम की खेती केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपराओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
क्षेत्र के कोलवी गांव के किसान करणसिंह परमार ने परिवार के साथ खेत में काली माता की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा की। पंडित बाबू व्यास ने मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न करवाई। परंपरा के अनुसार अफीम की चिराई से पहले खेत की मेड़ पर काली माता की पूजा की जाती है तथा शुभ मुहूर्त में पांच या सात डोडों की विशेष पूजा की जाती है। इसके बाद ही पके हुए डोडों पर चीरा लगाने की प्रक्रिया शुरू होती है।
किसानों के अनुसार आने वाले दिनों में चिराई का कार्य नियमित रूप से चलता रहेगा। चीरा लगाने के बाद डोडों से निकलने वाले दूध को एकत्र किया जाता है। इसके लिए किसान सूर्योदय से पहले ही परिवार के साथ नंगे पांव खेतों में पहुंचते हैं और विशेष औजार से डोडों पर चीरा लगाकर अफीम का दूध छरपले में इकट्ठा करते हैं।
किसान लक्ष्मण सिंह गुर्जर और करण सिंह ने बताया कि इस दौरान फसल की कड़ी निगरानी भी रखी जाती है, ताकि पशु-पक्षी या तस्कर किसी तरह का नुकसान न पहुंचा सकें। क्षेत्र में अफीम उत्पादन किसानों की आर्थिक रीढ़ माना जाता है और इससे जुड़ी धार्मिक परंपराएं इस खेती को एक अलग पहचान भी देती हैं।




















































