नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों में बढ़ता टकराव खतरनाक?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

अफसरशाही की हेकड़ी –

नीरज मेहरा 

जयपुर । नौकरशाही -अफसरशाही प्रदेश में हावी है , अफसरशाही से सीएम से लेकर विधायक तक परेशान है।  मंत्रियों ने लगाए कई बार खुलकर आरोप, विधायकों ने सार्वजनिक मंचों से उठाए मुद्दे, अफसरशाही और व्यवस्थापिका में टकराव नया नहीं,क्या अफसरशाही पर लगेगी लगाम?जनप्रतिनिधियों की नहीं होती सुनवाई, दोनों में अहम का टकराव, नौकरशाही बेलगाम, सीएम भी लगा चुके कई बार फटकार बावजूद  ये  रुकने का नाम नहीं ले रही।    हालत यह है कि कई मंत्रियों ने अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है तो कई अधिकारी भी मंत्रियों का काम करना तो दूर फोन तक नहीं उठाते।   यहां तक की प्रदेश के सबसे बड़े  अधिकारी को भी टकराव के कारण अपना कार्यकाल छोड़कर बीच में ही दिल्ली जाना पड़ा,यह जग जाहिर है। लेकिन चुने हुए जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच का  टकराव प्रदेश के हित में नहीं है । यह टकराव है आपसी अहंकार का और इस अहंकार को दूर रखकर जनप्रतिनिधियों को अधिकारियों को अपने-अपने प्रोटोकॉल का पालन करना होगा।

राजस्थान के चर्चित मामले जब नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों में टकराव हुआ

क्या वास्तव में राजस्थान में नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों में टकराव की घटनाएं सामान्य है देखा जाए तो खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा कई बार अफसर को सचेत कर चुके सावचेत कर चुके , कई बार मुख्यमंत्री के आदेशों की अनदेखी के चर्चे भी मीडिया की सुर्खियां बटोर चुके हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें अधिकारी सीएम के आदेश को भी डालने की कोशिश करता है तो मुख्यमंत्री ने उसे फटकार लगाई सुबह के बड़े बाबू से मुख्यमंत्री का टकराव जगजाहिर है।

सरकार में बैठे मंत्री , विधायक, सांसद और प्रधानों ने भी अफसरशाही पर सुनवाई नहीं करने के आरोप लगाये है। यहां तक कि कई बार तो विधायकों को जिला कलेक्टर अपने चैंबर में बैठने तक को कुर्सी नहीं देते…. जिससे साफ है कि प्रदेश में अफसरशाही हावी होती जा रही है।

पूर्व मुख्यमंत्री  वसुंधरा राजे  ने  भी  लगाया  था  अधिकारियों के  बेलगाम  होने का  आरोप 

राजस्थान में भजनलाल सरकार के दो साल बाद भी मंत्री, विधायक और यहां तक की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तक ने अफसरों पर तानाशाही रवैया अपनाने का  आरोप लगाया है । पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का मुद्दा उठाया है । कहा कि प्रदेश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है सरकार पैसा भेज रही है लेकिन सही तरीके से इम्लीमेंट नहीं हो रहा है। अधिकारी जन प्रतिनिधियों की सुनते नहीं है।  अधिकारी- कर्मचारियों को ये गलत फहमी है की वे सरकार के नियमित स्थाई कारिंदे है, सरकारें तो आती- जाती रहती है.. इसलिए वे हठधर्मिता अपनाते हैं। जिसके चलते अफसरशाही और जनप्रतिनिधियों में टकराव होता है।

डॉ किरोडी लाल मीणा के आरोप

राजस्थान सरकार में सबसे वरिष्ठ कृषि मंत्री डॉक्टर किरोडी लाल मीणा भी अफसरशाही से परेशान है। उन्होंने खाद -बीज कंपनियों पर जब छापेमारी की थी तब अफसरो ने उन्हें सहयोग नहीं किया। वह अधिकारियों को कई बार सार्वजनिक मंचों से भी फटकार लगा चुके हैं। कई बार शासन सचिवालय के अधिकारियों पर भी आरोप लगा चुके हैं। जनहित के मुद्दों को लेकर हुए कई बार सार्वजनिक मंचों पर अधिकारियों पर जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा के आरोप लगा चुके हैं। हाल ही में सवाई माधोपुर दौरे के दौरान निर्माण कार्यों को लेकर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अधिकारियों पर भ्रष्टाचारी होने के आरोप लगाए हैं। डॉक्टर किरोडी लाल मीणा, वसुंधरा सरकार के दौरान भी जब रसद मंत्री थे तो उन्होंने अधिकारियों पर काम नहीं करने के आरोप लगाते हुए कई बार आरोप  लगाए थे।  पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल के दौरान भी  कई बार पुलिस और अधिकारियों पर  आरोप लगाकर कई बार दौसा से कूच कर चुके हैं। जाहिर सी बात है कि जब डॉक्टर किरोडी लाल मीणा इस तरह के आरोप लगाते हैं तो आप समझ सकते हैं कि नौकरशाही कितनी हावी है, क्योंकि जब तेज तर्रार मंत्री डॉ किरोडी लाल मीणा ही नौकरशाही से परेशान है तो फिर आम आदमी की सुनवाई कैसे होती होगी?

वासुदेव देवनानी  विधानसभा अध्यक्ष

राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी भी सार्वजनिक मंचों पर कई बार अधिकारियों पर मनमानी करने और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करने का आरोप लगा चुके हैं हाल ही में एक मामले में उन्होंने जिला कलेक्टर को तलब किया तो जिला कलेक्टर ने आना तक उचित नहीं समझा। उनका मानना है की अफसर शाही कहीं-कहीं हावी है।

उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी

राजस्थान की दूसरी बड़ी पावर सेंटर उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी भी अफसर की तानाशाही को लेकर परेशान है । वह भी कई बार सर्वजनिकांटों से जड़ा नगर निगम और अन्य विभाग के अधिकारियों को फटकार लगा चुकी है । उनका भी कहना है कि अधिकारी कर्मचारी काम नहीं करते हैं जिसकी चलते लोग परेशान रहते हैं।

डॉ प्रेमचंद बैरवा उपमुख्यमंत्री

सरकार के अनुसार तीसरी बड़ी पावर उप मुख्यमंत्री के तौर पर डॉक्टर प्रेमचंद बैरवा को माना जाता है लेकिन सबको पता है कि उनकी कितनी चलती है। डेढ़ साल तक तो उनके कई विभागों में पीआरओ तक नहीं लगे खुद के पास लगी अधिकारियों को बचाने के लिए भी उन्हें मुख्यमंत्री तक जाना पड़ा वह भी सार्वजनिक मंच पर कह चुके कि जो विकास कार्य नहीं करेगा वह अपना बोरिया बिस्तर बांध ले उनका यह वीडियो खूब जमकर वायरल भी हुआ। हालांकि वे शांत स्वभाव के हैं लेकिन कई बार उनके विभागीय कार्य नहीं होने पर भी अपनी नाराजगी जगजीत कर चुके हैं।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ उद्योग मंत्री

पावरफुल समझे जाने वाले  उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ कि अधिकारियों से लड़ाई कई बार खुलकर सामने आ चुकी है जेडीए की कई मीटिंगों के दौरान हुए अधिकारियों पर  उपेक्षा  करने का आरोप लगा चुके हैं। कभी पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों से तो कभी नगर निगम के अधिकारियों से उनका टकराव कई बार सामने आ चुका है एक बार तूने एक आर्मी मैन को न्याय दिलाने के लिए खाने तक पर धरना देना पड़ा यह भी कहीं नहीं अफसर शाही की अनदेखी का ही मामला है।

कन्हैयालाल चौधरी जलदाय मंत्री

जलदाय मंत्री कन्हैया लाल चौधरी भी सार्वजनिक तौर पर कई बार अधिकारियों पर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करने का आरोप लगा चुके हैं। विभाग के भी अधिकारियों पर भ्रष्टाचार करने और  नेताओं के निर्देशों की पालना नहीं करने की बात कह चुके हैं। उन्होंने अधिकारियों की शिकायत सीएम तक भी की है।

जवाहर सिंह  बेडम गृह राज्य मंत्री

गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेदम भी कई बार अधिकारियों को सार्वजनिक मंच  से फटकार लगा चुके हैं। उनका तो यहां तक कहना था कि कई बार अधिकारी केवल में बैठने तक के लिए कुर्सी नहीं उनका तो यहां तक कहना था कि कई बार अधिकारी चेंबर  में बैठने तक के लिए कुर्सी नहीं देते।

संजय शर्मा वन एवं पर्यावरण मंत्री

नौकरशाही से वन एवं पर्यावरण मंत्री भी नाराजगी जनता चुके हैं। अलवर में कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने अधिकारियों पर उपेक्षा का आरोप लगाया, तो कुछ दिनों पहले रणथंबोर में उन्होंने  ओचक निरीक्षण किया तो  अधिकारियों ने उन्हें पहचाना तक नहीं । संजय शर्मा कई बार अधिकारियों की शिकायत मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भी कर चुके हैं ।उनका भी कहना है कि अधिकारी बेलगाम है सुनवाई नहीं करते हैं।

विधायक गोपाल शर्मा, बालमुकुंदचार्य, शंकर सिंह रावत, अनीता बघेल, समेत   दर्जनों विधायक है जो सार्वजनिक रूप से अधिकारियों पर उपेक्षा का आरोप लगा चुके हैं।

विधायक शंकर सिंह रावत का तो यहां तक आरोपी की एसपी कलेक्टर तो चेंबर के बाहर विधायकों को इंतजार करते हैं विधायक गोपाल शर्मा आए दिन अफसरो पर तानाशाही करने का आरोप लगाते हैं। नगर निगम, जेडीए ,पुलिस अधिकारियों के कई बार झड़प हो चुकी है ।  जो मीडिया की सुर्खियां बन चुकी है ।हवामहल विधायक बालमुकुंदचार्य का तो आए दिन ही अधिकारों से पंगा होता है। वह भी अधिकारियों की  शिकायत कर चुके हैं।   पूर्व मंत्री और विधायक के अनीता बघेल ने भी अफसरो  पर  अनदेखी का आरोप लगा चुके है। बांदीकुई के विधायक भागचंद टंकड़ा कई बार सार्वजनिक मंचों पर अधिकारियों की शिकायत कर चुके हैं उनके अधिकारियों से कई बार टकराव हो चुका है महुआ विधायक राजेंद्र मीणा भी कई बार अधिकारियों की शिकायतें कर चुके हैं उन्होंने भी अधिकारियों पर  अनदेखी  करने  का आरोप लगाया है।

हनुमान बेनीवाल सांसद आरएलपी भी परेशान

आरएलपी के सांसद हनुमान बेनीवाल का तो आए दिन अधिकारियों से पंगा होता ही रहता है । वह अधिकारियों के खिलाफ आए दिन मोर्चा खोलते रहते हैं ।उनका भी कहना है कि मौजूदा सरकार में अफसर शाही ज्यादा हावी है ।जनप्रतिनिधियों की  उपेक्षा करना अधिकारियों की आदत सी बन गई है इसमें सुधार होना चाहिए।

रविंद्र सिंह भाटी निर्दलीय विधायक

बाड़मेर की शिव विधानसभा से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी का अधिकारियों से आए दिन टकराव होता रहता है। जिला कलेक्टर टीना डाबी की कार्यशैली को लेकर वह कई बार मीटिंग में मुद्दा उठा चुके हैं ।अभी खेजड़ली प्रकरण को लेकर भी उनके अधिकारी से टकराव हुआ है पुलिस अधिकारियों और सभी विभागों के अधिकारियों पर हुए कई बार सार्वजनिक रूप से तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाते रहते हैं।

 

नेता प्रतिपक्ष टीका राम जूली और कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी सरकार पर तीखा हमला बोला है… दोनों नेताओँ का आरोप है की विपक्ष के विधायकों के साथ तो अधिकारी दोहरा व्यवहार करते ही है। विधायकों के फोन नहीं उठाते, उनके काम नहीं करते , चैंबर में बैठने को कुर्सी नहीं देते। कांग्रेस के अधिकांश विधायकों के अधिकारियों पर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करने का आरोप है। डोटासरा और टीकाराम जूली तो कई बार सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगा चुके की सरकार में चल किसकी रही है यह पता ही नहीं लगता क्योंकि अधिकारी मंत्रियों की सुनते नहीं है विधायकों की नहीं सुनते हैं जब सत्ताधारी मंत्री और विधायकों की नहीं सुनवाई हो रही है तो फिर विपक्ष के विधायकों और सांसदों की सुनवाई का तो आप अंदाजा ही लगा सकते हैं।

विधायक डीसी बैरवा और तहसीलदार का टकराव जग जाहिर

हाल ही में दौसा में एसडीएम ने विधायक डीसी बैरवा से अभर्द व्यवहार किया। विधायक के एक सवाल पूछने पर गलत करने और थाने में बंद करने की धमकी दी गई। इसको लेकर विधायक डीसी बैरवा सदन में दो बार सवाल भी उठा चुके हैं। विधानसभा विशेष अधिकार हनन कमेटी इस मामले में तहसीलदार को विधानसभा बुलाकर पूछताछ करेगी मामले की जांच करेगी हालांकि इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष जिला कलेक्टर को तबला कर चुके हैं लेकिन जिला कलेक्टर विधानसभा नहीं आए अब इससे ज्यादा अफसर शाही हावी होने का क्या मामला हो सकता है।

सांसद राजकुमार रोत, मन्नालाल रावत, मंजू शर्मा मुरारी मीणा समेत कई सांसद दुखी

नौकरशाही से  सत्ता पक्ष विधायक सांसद ही परेशान नहीं है विपक्ष के सांसद और विधायक भी परेशान है हाल ही में आप पार्टी के सांसद राजकुमार रोड में भी अधिकारियों पर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया है उनका कहना है कि अधिकारी उनके फोन तक नहीं उठाते लोगों के काम क्या  खाक करेंगे। उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत, जयपुर की सांसद मंजू शर्मा भी अधिकारियों की तानाशाही रवैया से परेशान है वह भी कई बार शिकायत कर चुकी है।

जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच टकराव का कारण क्या है ?

नौकरशाही को लेकर जब सत्ताधारी दल के नेता कुछ नहीं है विपक्ष के नेताओं के तो खुश होने की बात ही दूसरी है तो आखिरकार ऐसा क्या कारण है कि अवसर सही और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है जन पर सबसे बड़ी बात जो सामने आई है वह यह कि इसमें अहम की लड़ाई बहुत ज्यादा बढ़ रही है। जनप्रतिनिधि कई बार तानाशाही रवैया अपनाते हैं ,वह अफसर को सार्वजनिक तौर पर प्रताड़ित और  बेइज्जत करने की कोशिश करते हैं। अफसर  नियम और कायदों के अनुसार ही काम करना  है,जब नियम विरुद्ध काम करने की बात आती है तो  उसको टालते हैं ।दूसरा अधिकारी यह मानकर बैठे हैं कि वह किसी भी सरकार को चलाने के लिए अहम कड़ी है और वह ही असली सरकार है। वे स्थाई है और जनप्रतिनिधि अस्थाई। जनप्रतिनिधि आते जाते रहते हैं ।आज इस पार्टी की सरकार है कल दूसरी पार्टी की सरकार होगी। असली जवाबदेही उन्हें की बनती है, जब जेल जाने की बात आती है तो उन्हें ही जाना पड़ता है ऐसे में भी गैर कानूनी काम नहीं करते हैं। कई बार अधिकारियों को ऐसा अहंकार होता है कि वह पढ़े-लिखे और विषय के विशेषज्ञ है, जबकि जनप्रतिनिधियों को कोई नॉलेज नहीं है । खास तौर पर यदि जब जनप्रतिनिधि नए-नए हो तो अफसर उन्हें गांठते तक नहीं है। कई बार भी विधायक सांसद और मंत्रियों के फोन तक भी नहीं उठाते और यही सबसे बड़े टकराव का कारण है।  जब जनप्रतिनिधि जनता के सामने बैठकर रॉब झाड़ने के लिए अफसर को फोन लगाते हैं ,तो सामने से अफसर भी या तो फोन ही नहीं उठाते ,या फिर कई बार उल्टा जवाब देते हैं । अब सोशल मीडिया का जमाना है तो यह चीज वायरल हो जाती है ,सबके सामने आ जाती है। यही कारण है कि अफसर और जनप्रतिनिधियों में लगातार टकराव बढ़ता जा रहा है । लेकिन यह  किसी भी तरीके से लोकतांत्रिक व्यवस्था में ठीक नहीं है। अधिकारियों को भले ही वह आईएएस अफसर हो या आरएएस अफसर हो, आईपीएस हो या आईपीएस हो ,सभी को एक निश्चित प्रोटोकॉल जो संविधान में दिया गया है, उसका पालन करना ही चाहिए और सामने वाले को सम्मान देना ही चाहिए, जिससे कि जन प्रतिनिधियों को और अधिकारियों के बीच में टकराव नहीं हो । विकास को गति मिल सके, जब तक अधिकारी और नेता अपने बीच का अहंकार नहीं छोड़ेंगे और प्रोटोकॉल का पालन नहीं करेंगे एक दूसरे को सुप्रीम पावर समझेंगे तब तक यह टकराव रुकने वाला नहीं है।  यह और ज्यादा बढ़ सकता है जिससे विकास ठप हो जाता है और प्रदेश की जनता को इसका नुकसान उठाना पड़ता है।

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