इंसान  ही  नहीं  तोते  भी  हैं अफीम के शौकिन ?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 

 (सुनील निगम की  रिपोर्ट)
काले सोने की सफेद फ़सल को नील गाय, तोते, मौसम और चोरों से बचाना बड़ी चुनौति!
गंगधार, झालावाड़।  सरकार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली अफीम की फसल, जिसे स्थानीय भाषा में ‘काला सोना‘ कहा जाता है, इन दिनों खेतों में पूरी तरह लहलहा रही है। जिले के कई गांवों में चारों तरफ अफीम की हरियाली नजर आ रही है, लेकिन इस चमक के पीछे किसानों के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें हैं। बढ़ती लागत, अनिश्चित मौसम और सुरक्षा के खतरों ने अफीम उत्पादक किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
मौसम की मार
फसल भले ही हरी-भरी दिख रही हो, लेकिन किसानो का कहना है कि इस बार मौसम ने पसीने छुड़ा दिए हैं। सुबह के समय घनी धुंध और अत्यधिक ओस के कारण अफीम के नाजुक पौधों में पीलापन आ रहा है। नमी बढ़ने से बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।फसल को बचाने के लिए किसानों को हर 8 से 10 दिन में कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ रहा है। एक बार के स्प्रे का खर्च 4 से 5 हजार रुपये तक आ रहा है, जिससे खेती की लागत उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
चोरी का खतरा
अफीम की सुरक्षा किसी सीमा की रखवाली से कम नहीं है। किसानों के सामने इस समय तीन बड़ी चुनौतियां हैं। नीलगायों और तोतो का आतंक, जाली लगाने के बाद भी नीलगाय खेतों में घुसकर फसल को बर्बाद कर रही हैं।
तोतों का पहरा, जैसे-जैसे पौधों पर डोडे बनने शुरू होंगे, तोतों का हमला बढ़ जाएगा. तोते डोडे को कुतरकर अफीम चट कर जाते हैं, जिससे बचाव के लिए पूरे खेत को नेट (जाली) से ढकना पड़ता है। तो वहीं डोडे से अफीम निकालने के समय चोरों का आतंक बढ़ जाता है, जिसके कारण किसानों को कड़ाके की ठंड में रात भर खेतों में जागकर पहरेदारी करनी पड़ रही है।
अफीम की खेती जितनी लाभदायक है, उतनी ही जोखिम भरी भी किसान इस ‘काले सोने’ को सहेजने के लिए अपनी जमा-पूंजी और रातों की नींद दोनों दांव पर लगा रहे हैं.
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