लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी
एक अनन्त बहस
प्राचीन मंदिरों से लेकर आधुनिक ड्रॉइंग रूम तक, कुंडली (जन्मपत्री) हमेशा आकर्षण, आस्था और कभी–कभी भय का विषय रही है। माता–पिता अक्सर सोचते हैं – क्या बच्चे की कुंडली दूसरों को दिखानी चाहिए या इसे निजी ही रखना चाहिए? क्या यह वास्तव में जीवन पर असर डालती है या सिर्फ़ एक परंपरा है? यह सवाल अंधविश्वास का नहीं, बल्कि विज्ञान, मनोविज्ञान और सामाजिक ज़िम्मेदारी का भी है।
मिथक बनाम वास्तविकता
कुंडली जन्म के समय ग्रह–नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होती है।
खगोलशास्त्र बताता है कि ग्रह कहाँ और कब हैं। ज्योतिषशास्त्र समझाता है कि उनका असर क्यों और कैसे पड़ता है। चंद्रमा ज्वार–भाटे को नियंत्रित करता है और यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। सूर्य और अन्य ग्रह जैविक लय, मानसिक स्वास्थ्य और मौसम को प्रभावित करते हैं। आधुनिक विज्ञान मानता है कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पृथ्वी और जीवों पर असर होता है।
इस दृष्टि से, ज्योतिष केवल अंधविश्वास नहीं बल्कि प्रकृति और मनुष्य के संबंध का एक सांकेतिक विज्ञान है।
कुंडली एक मनोवैज्ञानिक दर्पण
कुंडली केवल भविष्यवाणी का साधन नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक नक्शा भी है।
यह किसी बच्चे की जन्मजात रचनात्मकता, विश्लेषणात्मक सोच या भावनात्मक संवेदनशीलता दिखा सकती है। यह स्वास्थ्य और शिक्षा के कुछ संकेत भी देती है। इस तरह यह माता–पिता के लिए डराने वाला साधन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन का उपकरण बन सकता है – जैसे कोई मेडिकल रिपोर्ट हमें खानपान और व्यायाम पर ध्यान देने की सलाह देती है।
कुंडली दिखाएँ या नहीं?
अभिभावक अक्सर सोचते हैं: क्या बच्चे की कुंडली दूसरों को दिखानी चाहिए?
हाँ, यदि – यह विवाह मिलान, चिकित्सा ज्योतिष, या करियर मार्गदर्शन के लिए किसी विश्वसनीय विशेषज्ञ को दिखाई जाती है।
नहीं, यदि – इसे यूँ ही दिखाया जाए और बच्चा “दोषयुक्त” या “कमजोर भाग्य वाला” कहकर लेबल कर दिया जाए। इससे बच्चे का आत्मविश्वास और मानसिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसलिए कुंडली दिखाने का निर्णय सामाजिक दबाव से नहीं, उपयोगिता और संवेदनशीलता से होना चाहिए।
माता–पिता की जिम्मेदारी – अंधविश्वास से आगे
ज्योतिष भाग्य का बंधन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन की दिशा है।
इसका उपयोग निर्णय थोपने में नहीं बल्कि संभावनाएँ पहचानने में होना चाहिए। यह बच्चे की कमज़ोरियों को सीमित करने का बहाना नहीं बल्कि सामर्थ्य को निखारने का साधन होना चाहिए। इसे हमेशा आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और संस्कारों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
आस्था और स्वतंत्रता का संतुलन
कुंडली हमें याद दिलाती है कि हम ब्रह्मांड की लय का हिस्सा हैं। लेकिन जीवन को आकार देने में मेहनत, संस्कार और मूल्य सबसे महत्वपूर्ण हैं।
जैसे मौसम का पूर्वानुमान हमें तैयार करता है पर बारिश रोक नहीं सकता, वैसे ही कुंडली हमें चेतावनी देती है परंतु निर्णय हमारी मेहनत और इच्छाशक्ति तय करती है।
कुंडली का महत्व न तो अंधविश्वास में है और न ही इसे पूरी तरह नकारने में। इसका असली मूल्य है – विज्ञान और अध्यात्म, भाग्य और पुरुषार्थ के बीच एक सेतु बनने में।
लेकिन सवाल है – कौन है असली विशेषज्ञ?
आज ज्योतिष का सबसे बड़ा संकट यही है कि हर कोई “पंडित” या “विशेषज्ञ” कहलाता है। ऐसे में माता–पिता कैसे पहचानें कि किसी व्यक्ति की सलाह पर भरोसा किया जा सकता है?
असली ज्योतिष–विशेषज्ञ की पहचान:
खगोलशास्त्र का ज्ञान – जो ग्रहों की गति, नक्षत्र और गणना की विधि समझता हो।
परंपरा और ग्रंथों की समझ – बृहज्जातक, फलदीपिका, पराशर संहिता जैसे प्रामाणिक शास्त्रों का अध्ययन किया हो।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि – जो बच्चे या व्यक्ति की कुंडली को डराने की जगह प्रेरित करने के लिए पढ़े।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण – जो कुंडली को शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व विकास से जोड़े, केवल अंधविश्वास से नहीं।
नैतिक जिम्मेदारी – जो कुंडली देखकर किसी को कमजोर या दोषयुक्त बताना या अपने स्वार्थ के लिए उसे हतोत्साहित करना किसी जघन्य अपराध से कम नहीं, ऐसा करने पर उस परिवार से श्री का जाना तय हो जाता है ।
अनुभव और परामर्श शैली – जो स्पष्ट, संतुलित और व्यावहारिक सुझाव दे, केवल भय या दिखावे के लिए उपाय न बताए।
कुंडली का महत्व तभी है जब इसे सही विशेषज्ञ की दृष्टि से पढ़ा जाए। माता–पिता को चाहिए कि वे अंधविश्वास और तर्क दोनों के बीच संतुलन बनाएँ और केवल ऐसे ज्योतिषियों पर भरोसा करें जो ज्ञान, अनुभव और नैतिकता से युक्त हों।
संतान का भविष्य कुंडली की लकीरों में कैद नहीं, बल्कि शिक्षा, मूल्य और अवसरों की रोशनी से गढ़ा जाता है। कुंडली मार्गदर्शन का दर्पण है, ताला नहीं।
