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श्राद्ध में पंडितों की कमी से लोग परेशान, नई पीढ़ी बना रही है श्राद्ध खाने से दूरी

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श्राद्ध में पंडितों की कमी से लोग परेशान, खान-पान पर भी नई पीढ़ी का असर
रितु मेहरा की रिपोर्ट
बुजुर्गों की बीमारियाँ और बदलते रिवाज़ बन रहे बड़ी परेशानी का कारण
जयपुर। श्राद्ध पक्ष की शुरुआत के साथ ही पितरों के तर्पण और ब्राह्मण भोज की परंपरा निभाने में इस बार लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, श्राद्ध भोज कराने के लिए पंडितों की कमी हो गई है। हालात यह हैं कि कई पंडितों को दिन में तीन-तीन बार अलग-अलग स्थानों पर भोजन करना पड़ रहा है।
पंडितों की कमी
समाज के बुजुर्गों के अनुसार, पहले हर घर में पंडितों की लंबी सूची मौजूद रहती थी, लेकिन अब स्थिति उलट हो गई है। ज्यादातर युवा पंडित श्राद्ध भोज से दूरी बना रहे हैं, जिसके चलते श्रद्धालुओं को बुलाए गए पंडितों का इंतजार करना पड़ रहा है।
नई पीढ़ी की बदलती सोच
श्राद्ध भोज को लेकर नई पीढ़ी में परंपरागत भोजन के प्रति अरुचि देखने को मिल रही है। कई युवा और बच्चे सामूहिक रूप से बैठकर प्रसादी खाने से बचते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जीवनशैली और खान-पान की आदतों में बदलाव के कारण यह स्थिति बन रही है।
बुजुर्गों पर स्वास्थ्य का असर
बुजुर्गों में शुगर और अन्य बीमारियों के कारण परंपरागत भोजन करने में दिक्कत आती है। मिठाई, पूड़ी, आलू की सब्ज़ी और भारी प्रसाद खाने से परहेज़ करने वाले बुजुर्ग अब हल्के भोजन की मांग करने लगे हैं। इससे भी परंपरा निभाने वालों को परेशानी हो रही है।
श्रद्धालुओं की चिंता
श्राद्ध कराने वाले लोग मानते हैं कि परंपरा निभाना जरूरी है, लेकिन पंडितों की कमी और खान-पान की नई चुनौतियों ने इस बार श्रद्धा के दिनों को कठिन बना दिया है। कई परिवारों को पंडितों की बुकिंग के लिए पहले से ही व्यवस्था करनी पड़ी। कई लोगों ने तो  पंडितों का कई घंटे तक इंतजार किया ,जब तक पंडित खाना नहीं खाते तब तक श्राद  पूरा नहीं होता है और परिवार के लोग भी खाना नहीं खा सकते ऐसी मान्यता है।

युवाओं ने बनाई श्राद्ध खाने से दूरी

जो ब्राह्मण परिवार श्राद्धों में खाना खाते हैं उनमें भी जो युवा वर्ग के लोग हैं वह श्राद्ध में दूसरे के खाना खाने नहीं जाते हैं, दरअसल लोगों में रुझान कम हो गया है।  युवा वर्ग श्राद खाना पसंद ही नहीं कर रहे ,  युवा वर्ग के पास समय नहीं है ,उन्हें  एक स्थान पर खाना खाने के लिए 2- 3 घंटे का समय खर्च होता है ऐसे में यदि कोई व्यक्ति दो परिवारों में खाना खाना जाता है तो उसका पूरा दिन खराब हो जाता है ऐसे में जो रोजगार करता है वहां से भी छुट्टी लेनी पड़ती है और जजमान दक्षिण बहुत कम देते हैं इसलिए युवा पीढ़ी खाना खाने जाती ही नहीं है बना कर देती है। 

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