Home rajasthan पंच्यावाला के जलेश्वर महादेव मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव

पंच्यावाला के जलेश्वर महादेव मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

भक्ति और उल्लास का संगम

जयपुर ।  महाराणा प्रताप मार्ग स्थित पंच्यावाला तलाई पार्क के जलेश्वर महादेव मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हर्षोल्लास और आस्था से मनाया गया।
मंदिर प्रांगण रंग-बिरंगे पुष्पों, दीपों और झिलमिलाती रोशनियों से सुसज्जित था। वातावरण में घंटियों की गूंज, शंखनाद और हरे कृष्ण के जयघोष गूँज रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो संपूर्ण वातावरण श्रीकृष्ण के अवतरण की प्रतीक्षा कर रहा हो।

शास्त्रोक्त विधि और मंत्रोच्चार का पावन क्षण ,रात्रि बारह बजते ही मंदिर में जन्म का वह दिव्य क्षण आया।

आचार्य  टेकचंद जी कश्मीरी और स्वामी वेदव्यास के द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आरंभ हुआ।

शास्त्रोक्त विधि से अभिषेक, पूजन, पाठ हुआ, जिसने भक्तों को ऐसा अनुभव कराया मानो स्वयं ब्रजधाम मंदिर में खड़े हों।

माखन-मिश्री का भोग लगाया गया — वही प्रिय व्यंजन जिसने नन्हें कान्हा की बाल लीलाओं को अमर बना दिया।श्रद्धालुओं की सहभागिता : भक्ति का मानवीय रूप
इस  अवसर पर भक्तगणों ने श्रद्धा अर्पित की

सुरेंद्र मीणा, रमेश चंद्र मीणा, योगेंद्र  मीणा, नंदलाल  चौधरी, राहुल कुमार, मोहनलाल  तथा पंडित कमलेश  चतुर्वेदी जैसे भक्तों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक भव्य बना दिया।सबने मिलकर आरती गायी, दीप प्रज्वलित किए और श्रीकृष्ण के भजनों में तन-मन को भिगो दिया।आरती की लौ के साथ भक्तों की आँखों में भी भक्ति की ज्योति झिलमिला रही थी।

कला, अध्यात्म और जीवन का संगम

जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह धर्म, कला और जीवन के अद्वैत का उत्सव है।श्रीकृष्ण का जन्म केवल मथुरा की कारागार की दीवारों में नहीं हुआ था, बल्कि हर उस हृदय में होता है जहाँ प्रेम, धर्म और करुणा का संकल्प जागता है।

जलेश्वर महादेव मंदिर का यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि आस्था केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सामूहिकता, सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह है।

इस आयोजन का महत्व केवल धार्मिक रस्मों में नहीं, बल्कि उस समन्वय की परंपरा में है जिसे भारतीय संस्कृति सदियों से सँजोए हुए है। यहाँ शास्त्र, संगीत, भक्ति और समाज सभी एक सूत्र में गुँथे दिखे।

जलेश्वर महादेव मंदिर की जन्माष्टमी हमें यह सिखाती है कि— जब समाज सामूहिक भक्ति में डूबता है, तो न केवल देवता प्रसन्न होते हैं, बल्कि मानवता भी आलोकित हो उठती है।
यह उत्सव केवल पंच्यावाला के एक मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि यह जयपुर की सांस्कृतिक चेतना और भारतीय अध्यात्म का जीवंत उत्सव है—जहाँ हर आरती की लौ, हर शंखनाद और हर भोग का ग्रास, स्वयं भगवान के प्रति हमारी अनन्य निष्ठा का प्रतीक है।

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