लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
भरतपुर की सियासत में बनाई अलग पहचान, वसुंधरा राजे सरकार में संभाले अहम मंत्रालय; जाट राजनीति में भी रहा खास प्रभाव
राजस्थान की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे रहे हैं, जिन्होंने चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर अपने क्षेत्र और समाज के बीच अलग पहचान बनाई। भरतपुर से आने वाले डॉ. दिगंबर सिंह उन्हीं नेताओं में शामिल रहे। पेशे से चिकित्सक, राजनीति में भाजपा के प्रमुख चेहरे और बाद में राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री बने दिगंबर सिंह ने पूर्वी राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
भरतपुर के बरखेड़ा फौजदार गांव से निकले दिगंबर सिंह का राजनीतिक सफर सीधे सत्ता से शुरू नहीं हुआ। पहले उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में काम किया, फिर संगठन की राजनीति में सक्रिय हुए और उसके बाद विधानसभा तक पहुंचे। वर्ष 2017 में निधन के समय तक वे राजस्थान भाजपा की राजनीति में एक प्रभावशाली जाट नेता के रूप में पहचाने जाते थे।
बरखेड़ा फौजदार में जन्म, डॉक्टर बनने का सपना
डॉ. दिगंबर सिंह का जन्म 1 अक्टूबर 1951 को भरतपुर जिले के बरखेड़ा फौजदार गांव में हुआ था। उनके पिता जवाहर सिंह पटवारी थे। प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान में हुई और उच्च शिक्षा के लिए वे चिकित्सा क्षेत्र में गए। उन्होंने जोधपुर के एसएन मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई की। चुनावी हलफनामे में भी उनकी शैक्षणिक योग्यता MBBS और स्त्री रोग संबंधी डिप्लोमा के रूप में दर्ज है।
चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सरकारी स्वास्थ्य सेवा में काम किया। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उन्होंने 1977 में चिकित्सा विभाग में सेवा शुरू की और भरतपुर क्षेत्र में चिकित्सक के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने भरतपुर में अपना निजी अस्पताल भी स्थापित किया। 1992 में उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर सक्रिय राजनीति की राह पकड़ी।
यहीं से डॉक्टर दिगंबर सिंह का सफर डॉक्टर से राजनेता बनने की ओर मुड़ा।
भाजपा संगठन से राजनीतिक पहचान की शुरुआत
दिगंबर सिंह भाजपा से जुड़े और भरतपुर जिले में संगठन को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाई। वे भाजपा के भरतपुर जिला अध्यक्ष भी रहे। यही वह दौर था जब पूर्वी राजस्थान में भाजपा का संगठन विस्तार कर रहा था और दिगंबर सिंह स्थानीय स्तर पर पार्टी का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।
राजनीति में उनकी पहली बड़ी चुनावी परीक्षा 1993 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में हुई। उन्होंने कुम्हेर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस के हरि सिंह से चुनाव हार गए। 1998 में भी कुम्हेर से उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
यानी उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत जीत से नहीं, बल्कि लगातार चुनावी संघर्ष से हुई।

1996 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा
विधानसभा राजनीति के साथ दिगंबर सिंह ने राष्ट्रीय राजनीति में जाने की कोशिश भी की। 1996 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भरतपुर से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नटवर सिंह के हाथों हार मिली।
यह हार उनके राजनीतिक सफर का अंत नहीं बनी। इसके बाद उन्होंने संगठन और विधानसभा क्षेत्र की राजनीति पर अपना फोकस बनाए रखा।
2003 में पहली बार विधानसभा जीत और मंत्री पद
दिगंबर सिंह के राजनीतिक सफर का निर्णायक मोड़ 2003 में आया। उन्होंने कुम्हेर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता। यही जीत उन्हें सीधे सत्ता के केंद्र तक ले गई।
वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद दिगंबर सिंह को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उन्हें चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, आयुर्वेद और परिवार कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विभाग मिले।
चिकित्सा क्षेत्र से राजनीति में आए दिगंबर सिंह के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय का जिम्मा उनके राजनीतिक और पेशेवर अनुभव के लिहाज से भी महत्वपूर्ण था।
स्वास्थ्य मंत्री के रूप में काम
स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को ग्रामीण स्तर तक पहुंचाने और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने से जुड़ी पहलें की गईं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में कार्यक्रम चलाए गए। स्वास्थ्य व्यवस्था में निगरानी और सरकारी अस्पतालों में व्यवस्थाओं को लेकर भी उन्होंने सक्रियता दिखाई।
उनके कार्यकाल से जुड़ी एक उल्लेखनीय पहल राजस्थान-नॉर्वे संयुक्त स्वास्थ्य कार्यक्रम भी रही, जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण और पोलियो उन्मूलन जैसे क्षेत्रों में सहयोग करना था।
चिकित्सक होने के कारण स्वास्थ्य विभाग में उनकी पृष्ठभूमि को राजनीतिक तौर पर भी उनकी बड़ी ताकत माना गया।
2008 में फिर जीते, इस बार मुकाबला भरतपुर राजघराने से
2008 का विधानसभा चुनाव दिगंबर सिंह के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित चुनाव माना जाता है।
परिसीमन के बाद कुम्हेर और डीग को मिलाकर डीग-कुम्हेर विधानसभा क्षेत्र बना। इसी दौर में भरतपुर राजघराने से जुड़े और तत्कालीन सांसद रहे विश्वेंद्र सिंह कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे।
मुकाबला सिर्फ दो प्रत्याशियों के बीच चुनावी लड़ाई नहीं था। यह भरतपुर क्षेत्र में दो प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों के बीच सीधी टक्कर बन गया।
दिगंबर सिंह ने विश्वेंद्र सिंह को लगभग 3,500 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव परिणाम ने भरतपुर की राजनीति में एक बड़ा संदेश दिया, क्योंकि डीग-कुम्हेर क्षेत्र में भरतपुर राजघराने का प्रभाव लंबे समय से माना जाता था।
इसी जीत के बाद दिगंबर सिंह की राजनीतिक हैसियत और मजबूत हुई।
उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी
2008 में भाजपा फिर सत्ता में आई तो दिगंबर सिंह को उद्योग विभाग की जिम्मेदारी दी गई। वे 2008-09 के दौरान उद्योग मंत्री रहे। इस दौर में उनका राजनीतिक कद सिर्फ भरतपुर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य स्तर पर भाजपा के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।
2013 की हार और इसके बाद भी सरकार में अहम भूमिका
2013 के विधानसभा चुनाव में दिगंबर सिंह को डीग-कुम्हेर सीट पर विश्वेंद्र सिंह से हार का सामना करना पड़ा। इस बार मुकाबले का परिणाम पिछली बार के बिल्कुल उलट रहा और विश्वेंद्र सिंह ने लगभग 11 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद दिगंबर सिंह की संगठन और सरकार में भूमिका समाप्त नहीं हुई।
2013 से 2015 के बीच वे राजस्थान भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे। इसके बाद 2015 में वसुंधरा राजे सरकार ने उन्हें बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति का उपाध्यक्ष बनाया और कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया।
2016 में उन्हें पंचायती राज, सामाजिक न्याय, कानून और कृषि सहित अतिरिक्त विभागों की जिम्मेदारियां भी दी गईं। इस दौर में वे सरकार के भीतर एक महत्वपूर्ण समन्वयकारी भूमिका में दिखाई देते थे।
भरतपुर और जाट राजनीति में कितनी बड़ी पहचान?
डॉ. दिगंबर सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान भरतपुर और पूर्वी राजस्थान के जाट नेता के रूप में बनी।
हिंदुस्तान टाइम्स ने उनके और विश्वेंद्र सिंह के बीच लंबे राजनीतिक मुकाबले को भरतपुर की जाट राजनीति के दो प्रमुख चेहरों की प्रतिस्पर्धा के रूप में रेखांकित किया था। 2008 में विश्वेंद्र सिंह को हराने के बाद दिगंबर सिंह की यह पहचान और मजबूत हुई।
भाजपा के लिए भी वे पूर्वी राजस्थान में एक महत्वपूर्ण जाट चेहरा माने जाते थे। उनके समर्थक आधार में भरतपुर-धौलपुर क्षेत्र के साथ जाट समाज का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता था। हालांकि उनकी राजनीति को केवल जातीय पहचान तक सीमित करना उनके पूरे राजनीतिक सफर को नहीं दर्शाता—वे भाजपा संगठन, सरकार और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी सक्रिय रहे।
जाट आंदोलन के दौर में भी सक्रिय भूमिका
2017 में राजस्थान में जाट आरक्षण आंदोलन का मुद्दा फिर प्रमुख हुआ। उस समय दिगंबर सिंह ने बातचीत और समाधान की प्रक्रिया में भूमिका निभाई। उनके राजनीतिक प्रभाव और जाट समाज के बीच स्वीकार्यता के कारण इस भूमिका को विशेष महत्व मिला। उपलब्ध स्रोत उन्हें उस दौर में समाधान की कोशिशों से जोड़ते हैं।
यह उनके राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी।
दो बार विधायक—चार बार विधायक होने की बात क्यों मिलती है?
डॉ. दिगंबर सिंह की राजनीतिक प्रोफाइल में एक तथ्य अक्सर भ्रम पैदा करता है। कुछ वेबसाइटें उन्हें चार बार विधायक बताती हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव परिणामों की उपलब्ध सूची के अनुसार स्थिति अलग है।
- 1993 — कुम्हेर: हार
- 1998 — कुम्हेर: हार
- 2003 — कुम्हेर: जीत
- 2008 — डीग-कुम्हेर: जीत
- 2013 — डीग-कुम्हेर: हार
इस लिहाज से वे दो बार निर्वाचित विधायक रहे—2003 और 2008 में। 2008 का चुनाव जीतकर वे डीग-कुम्हेर सीट के पहले विधायक भी बने।
अंतिम दौर और निधन
राजनीतिक जीवन के अंतिम वर्षों में दिगंबर सिंह लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे। 27 अक्टूबर 2017 को जयपुर में उनका निधन हुआ। वे 66 वर्ष के थे। उनके निधन के बाद भरतपुर में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन पर भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के नेताओं ने शोक व्यक्त किया।
राजनीतिक विरासत
डॉ. दिगंबर सिंह की कहानी एक ऐसे नेता की है, जिसने गांव से निकलकर चिकित्सा को अपना पेशा बनाया, सरकारी सेवा में काम किया, फिर संगठन की राजनीति में आया और चुनावी हार के बावजूद लगातार संघर्ष करते हुए सत्ता तक पहुंचा।
1993 और 1998 की चुनावी हार के बाद 2003 की जीत ने उनकी राजनीति को नई दिशा दी। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने अपने चिकित्सा अनुभव का इस्तेमाल किया, 2008 में विश्वेंद्र सिंह को हराकर भरतपुर की राजनीति में बड़ा संदेश दिया और उद्योग मंत्री के रूप में राज्य सरकार में भूमिका निभाई।
2013 में विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद वे राजनीति से बाहर नहीं हुए। बीस सूत्री कार्यक्रम समिति के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री दर्जे के साथ वे सरकार और संगठन में सक्रिय रहे।
भरतपुर की राजनीति में उनकी पहचान सिर्फ एक विधायक या मंत्री की नहीं रही। वे भाजपा के ऐसे क्षेत्रीय चेहरे बने, जिनकी राजनीतिक यात्रा ने पूर्वी राजस्थान में भाजपा के विस्तार, जाट राजनीति और भरतपुर राजघराने के साथ लंबे राजनीतिक मुकाबले—तीनों को प्रभावित किया।
उनके निधन के बाद उनके परिवार ने भी राजनीति में कदम रखा। उनके पुत्र डॉ. शैलेश सिंह बाद में डीग-कुम्हेर से चुनावी राजनीति में आए और 2023 में इसी क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। इस तरह दिगंबर सिंह की राजनीतिक विरासत अगली पीढ़ी तक भी पहुंची।
एक नजर में डॉ. दिगंबर सिंह
जन्म: 1 अक्टूबर 1951, बरखेड़ा फौजदार, भरतपुर
शिक्षा: MBBS, एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर; स्त्री रोग संबंधी डिप्लोमा
पेशा: चिकित्सक
सरकारी सेवा से इस्तीफा: 1992
राजनीतिक दल: भारतीय जनता पार्टी
पहली विधानसभा जीत: 2003, कुम्हेर
दूसरी विधानसभा जीत: 2008, डीग-कुम्हेर
कैबिनेट मंत्री: 2003-08 स्वास्थ्य/आयुर्वेद/परिवार कल्याण; 2008-09 उद्योग
बीस सूत्री कार्यक्रम: 2015 से 2017, कैबिनेट मंत्री दर्जा
अतिरिक्त जिम्मेदारियां: पंचायती राज, सामाजिक न्याय, कानून और कृषि आदि
निधन: 27 अक्टूबर 2017, जयपुर
आयु: 66 वर्ष