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बिहार की राजनीति — जहाँ लोकतंत्र का “मेला” अब भी लगता है, पर वहाँ की “भीड़” अब तमाशा देखकर लौट जाती है

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लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
अहसास की कलम से …..
बिहार की राजनीति
जहाँ लोकतंत्र का “मेला” अब भी लगता है,
पर वहाँ की “भीड़” अब तमाशा देखकर लौट जाती है।
आज बिहार में चुनाव की हलचलें शुरू हैं, लेकिन हवा में एक अजीब सी चुप्पी तैर रही है —
बीजेपी और नीतीश कुमार, दोनों किसी मौन व्रत में बैठे हैं
ना जोश, ना नारा, ना जनसभा की गूंज — बस रणनीति की गंध, जो किसी बंद कमरे में पक रही है।
उधर लालू यादव और तेजस्वी यादव भी असामान्य रूप से शांत हैं।
जैसे किसी बड़े खेल से पहले खिलाड़ी मैदान नहीं, बल्कि शतरंज की बिसात पर एक-दूसरे की चाल पढ़ रहे हों।
और इस मौन राजनीति के बीच,
एक आवाज़ लगातार गूंज रही है — प्रशांत किशोर की।
जन सुराज अभियान ने मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक ऐसा कब्ज़ा कर लिया है,
जैसे पूरा बिहार एक ही नाम दोहरा रहा हो — “पीके क्या कर देंगे?”
हां, यह तय है —
जन सुराज बहुमत में आए या न आए,
लेकिन समीकरण जरूर बदलेंगे।
क्योंकि जो लोग अब तक जाति के तराजू से वोट तौलते थे,
अब वो विचार के वजन से थोड़ा असहज हैं।
बिहार की राजनीति हमेशा से वायदों की प्रयोगशाला रही है —
कभी “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा,
कभी “सत्ता में समाजवाद” का सपना टूटा,
कभी “गठबंधन धर्म” के नाम पर सिद्धांतों का सौदा हुआ।
यहाँ नेता बदलते हैं,
नारे बदलते हैं,
पर जनता का हाल वैसा ही रहता है —
बेचैन, बेरोजगार और बस भरोसे में ठगी हुई।
राजनीति यहाँ मुद्दों से नहीं,
“मुहावरों” से चलती है।
कभी “सुशासन बाबू”, कभी “लालू राज”,
कभी “डबल इंजन सरकार”,
पर इंजन वही पुराना —
जो स्टेशन से हिलने से पहले ही धुआं छोड़ देता है।
और यह कटाक्ष भी जरूरी है —
बिहार में विकास की फाइलें अब भी घूस की स्याही से लिखी जाती हैं,
नौकरशाही राजनीतिक चापलूसी की सीढ़ी बन चुकी है,
और जनता —
अब भी “भविष्य” के नाम पर “फिर से वादा” सुन रही है।
शायद यही बिहार की असली त्रासदी है —
यहाँ राजनीति जनसेवा नहीं, जनसंवाद का अभिनय बन चुकी है।
जहाँ जनता तालियाँ बजाने को मजबूर है,
और नेता वही पुराना स्क्रिप्ट बार-बार पढ़ रहे हैं —
थोड़े नए चेहरे,
थोड़े पुराने झूठ।
अगर यही “चुनाव” है,
तो फिर लोकतंत्र नहीं,
एक सजाया गया भ्रम है —
जिसमें हर पाँच साल बाद जनता को सिर्फ़ “आशा” की मिठाई दी जाती है,
जिसका स्वाद बहुत मीठा होता है,
पर पेट कभी नहीं भरता।

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