लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
*डिग्गी कल्याण जी को छै ढूंढाड़ देश,*
*कलयुग में काटे छै सारा क्लेश*
जितेन्द्र सिंह शेखावत
वरिष्ठ पत्रकार रा.प.
डिग्गीपुरी के राजा कल्याणजी महाराज की पदयात्रा अब ढूंढाड़ की सबसे बड़ी पदयात्रा बन गई है।
करीब सतर साल पहले बगरु वालों का रास्ता की गुल्ली देवी छीपा ने कुछ महिलाओं के साथ पुरानी बस्ती के गोपीनाथ जी मंदिर से डिग्गी पदयात्रा का बीड़ा उठाया था ।
1963 जयपुर के बोरडी के कुए का रास्ता से शुरू हुई थी पदयात्रा
इसके बाद 1963 मे बोरड़ी का कुए का रास्ता निवासी शंकर लाल पूड़ीवाला व उनकी पत्नी सरजू देवी ने कुछ भक्तों के साथ छोटी चौपड़ के रूप चतुर्भुज जी मंदिर से पदयात्रा शुरू की थी।
कल्याण जी का रास्ता स्थित कल्याण मंदिर से कार्तिक मास में भी पदयात्रा निकलती है । वर्ष 1965 में रामेश्वर लाल लोहेवाला व उनकी पत्नी केसर देवी ने ताड़केश्वर मंदिर से कुछ लोगों को जोड़कर यात्रा शुरू की थी।
*पुराने समय में ठेलों और बैल गाड़ियों में सामान लेकर जाते थे ।*
ताड़केश्वर मंदिर से शुरू यात्रा मोती डूंगरी गणेश जी और सांगानेर में सांगा बाबा का दर्शन कर पहले दिन मदरामपुरा में रात का पड़ाव करती है । उन दिनों पदयात्री रात में गैस की लालटेन जलाकर भजन सत्संग करते थे । दूसरे दिन रेनवाल, तीसरे दिन बांडी नदी में स्नान के बाद रात्रि विश्राम करते हैं । चौथे दिन चौसला और पांचवें दिन शाम को डिग्गी के कल्याण मंदिर में यात्रा का झंडा चढ़ाया जाता है । इतिहासकार डॉ राघवेंद्र सिंह मनोहर ने लिखा है कि डिग्गी कल्याणजी दीन दुखियों के दुखः व रोगों के मुक्तिदाता है।
*इतिहासकार पंडित गोपाल नारायण बहुरा ने लिखा है कि सिटी पैलेस संग्रहालय में रखे मान सिंह के शस्त्र पर डिग्गी के हरि सिंह खंगारोत का नाम फारसी भाषा में अंकित है । डिग्गी के एक कुंवर पृथ्वी सिंह ने जमवाय माता मंदिर की रक्षार्थ काणीखोह के निकट लड़ाई में वीरगति प्राप्त की थी। जमवाय माता के मंदिर में के शिलालेख में पृथ्वी सिंह का नाम अंकित है* ।
डिग्गी के कल्याण जी का मंदिर कई मान्यताओं से जुड़ने की वजह से विश्व प्रसिद्ध है । संवत 1584 यानी वर्ष 1527 में मंदिर का पुनर्निर्माण मेवाड़ के तत्कालीन राणा संग्राम सिंह के शासनकाल में हुआ । मंदिर में कल्याण जी की सफेद संगमरमर की मूर्ति अद्वितीय है । मंदिर की स्थापना से पहले ही कई रोचक कथाएं यहां से जुड़ी हुई है । यह मंदिर दसवीं शताब्दी का बना हुआ है । डिग्गी में रहने वाले गुर्जर गोड वंश के पंडितो की ओर से सेवा पूजा की जाती है । मंदिर के इतिहास और की किवदंतियों के अनुसार राजा डिग्व को कुष्ठ रोग हो गया था और भगवान विष्णु की कृपा से उन्होंने समुद्र से एक मूर्ति प्राप्त की और को डिग्गी में स्थापित किया । जिससे उनका रोग ठीक हो गया था। इसीलिए सदियों से आज तक भी लोग यहां पर कुष्ठ रोग ,असाध्य रोग, आंखों की रोशनी ,चर्म रोग ,पुत्र प्राप्ति, अच्छे स्वास्थ्य के लिए डिग्गी कल्याण जी की पदयात्रा करते हैं।
