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ऑपरेशन महादेव: आतंकवाद पर राजनीति या राष्ट्रनीति?”

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हेमराज तिवारी

“संसद लोकतंत्र का मंदिर है, और सवाल लोकतंत्र का संकल्प। जब सवालों से असहजता होती है, तब समझो कि लोकतंत्र ज़िंदा है।”

एक्शन के पीछे इरादा ज़रूरी है…

22 जुलाई की लोकसभा बहस के दौरान जब अखिलेश यादव ने “ऑपरेशन महादेव” पर पांच सवाल उठाए, तो सत्ता पक्ष असहज हो उठा। जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा – “क्या ऑपरेशन को सावन के सोमवार तक टाल देते?”

लेकिन प्रश्न यह नहीं था कि ऑपरेशन क्यों हुआ — प्रश्न यह था कि ठीक उसी दिन क्यों हुआ, और क्या यह सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा था या सरकार का प्रबंधित नैरेटिव?

अखिलेश के सवाल केवल विपक्ष की रणनीति नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक की चिंता हैं:

Encounter कल ही क्यों हुआ?”

क्या यह केवल एक संयोग था कि संसद में उसी दिन आतंकी हमले पर बहस चल रही थी, जिस दिन “पहल्गाम हमले” के आरोपी आतंकियों को मार गिराया गया?

क्या यह राजनीतिक नेरेटिव गढ़ने का प्रयास है?”

सवाल है — क्या ऑपरेशन की टाइमिंग इसीलिए तय की गई ताकि सरकार यह संदेश दे सके: “हम जवाब दे रहे हैं – देखिए कितने तेज़ हैं हम!”

क्या इंटेलिजेंस फेलियर नहीं हुआ?”

अगर आतंकियों की लोकेशन, प्लानिंग और रणनीति पहले से पता थी, तो पहलगाम जैसी घटनाएं रोकने में असफलता क्यों हुई?

पुलवामा की पुनरावृत्ति क्यों?”

2019 की त्रासदी के बाद क्या हमने कुछ सीखा नहीं? जब निगरानी प्रणालियाँ, उपग्रह, ड्रोन, खुफिया तंत्र सक्रिय हैं — तब RDX से लदी गाड़ियाँ कैसे गुजर जाती हैं?

सीज़फायर की घोषणा किसने की – भारत या अमेरिका?”

क्या कूटनीति की कमान अब राष्ट्रों के हाथ में है या शक्तिशाली नेताओं के इशारे पर? क्या भारत अब भी नीतियों में आत्मनिर्भर है या कूटनीति में भी आयातित निर्णय चल रहे हैं?

، सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह ने राष्ट्रभक्ति है ?

जब सत्ता सवालों से चिढ़ने लगे, तब समझिए लोकतंत्र एक प्रचार अभियान में बदल रहा है।

“सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं, कर्तव्य है — विपक्ष का ही नहीं, हर भारतीय का।”

हर बार जब कोई अखिलेश, राहुल, या किसी अन्य नेता द्वारा पूछे गए सवालों को ‘देशद्रोह’ या ‘राजनीति’ बता दिया जाता है, तब ईमानदार राष्ट्रवाद की आत्मा आहत होती है।
Honesty is a virtue, not performance.

आज सत्ता, विपक्ष और मीडिया — सब कुछ नाटक, इवेंट और स्क्रिप्टेड नेरेटिव में बदल गया है।
लेकिन “सच्चाई” कभी स्क्रिप्टेड नहीं होती।
वह तब प्रकट होती है जब कोई अखिलेश खड़ा होता है और पूछता है —

Encounter कल ही क्यों हुआ?”

क्या हमें डर है सवालों से? या जवाबों से? यह लेख किसी पार्टी या नेता के समर्थन या विरोध में नहीं — यह राष्ट्र की उस चुप्पी के खिलाफ है जो धीरे-धीरे सवालों से डरने लगी है।
अगर आतंकवादियों पर कार्रवाई हो रही है, बहुत अच्छा — लेकिन लोकतंत्र में कार्रवाई के पीछे जवाबदेही भी होनी चाहिए। “हम आतंकवाद के खिलाफ हैं, लेकिन जवाबदेही के पक्ष में भी। हम सैनिकों की वीरता के साथ हैं, पर सत्ता की चतुराई पर मौन नहीं।”

सवाल मत मारो — सवालों से लोकतंत्र चलता है। जवाब दो, जवाबदेह बनो।”

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