लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“ज़िंदगी क्या है?”
शायद यह प्रश्न उतना ही पुराना है जितना मनुष्य का अस्तित्व। कोई इसे अवसर मानता है, कोई संघर्ष, कोई परीक्षा और कोई माया। परंतु यदि एक सरल दृष्टि से देखें तो — ज़िंदगी एक कक्षा (Classroom) है।
कक्षा 1: मासूमी की किताब
जब हम स्कूल की पहली कक्षा में होते हैं, तो हमारा नज़रिया बेहद मासूम होता है।
एक छोटी-सी पेंसिल, एक कटा हुआ रबर, और एक अच्छे नंबर की लाल स्याही से लिखी तारीफ़ ही ज़िंदगी लगती है।
हम सीखते हैं — गिरना और उठना।
कक्षा 10: पहचान की खोज
बचपन बीतता है, हम बड़े होते हैं।
अब नंबरों के पीछे भागना शुरू होता है — लेकिन ये नंबर सिर्फ़ परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहते —
अब तुलना होती है कपड़ों से, मोबाइल से, रिश्तों से, और धीरे-धीरे हम ‘अपेक्षाओं के छात्र’ बन जाते हैं।
शादी: पाठ्यक्रम का मोड़
शादी ज़िंदगी का वो चैप्टर है, जहाँ पाठ्यक्रम बदलता है।
अब हम अकेले नहीं होते, अब ज़िम्मेदारियाँ होती हैं — रिश्तों की, समय की, पैसे की।
अब हम सीखते हैं — समर्पण, समझौता, त्याग।
पर कुछ लोग इसे भी स्वार्थ के व्यापार में बदल देते हैं।
दूसरों को जज करने की आदत:
कुछ लोग जीवन में जो भुगतते हैं, वही दूसरों के साथ करने लगते हैं।
अपनी गलती को “मजबूरी” कहकर बच निकलते हैं, लेकिन दूसरों की भूल को “चरित्र” का प्रश्न बना देते हैं।
यह प्रवृत्ति नहीं — एक सामाजिक विष है।
धन, मकान, गाड़ी — क्या यही श्रेष्ठता का प्रमाण है?
आज की दुनिया में सफलता को गाड़ी, पैसा, ब्रांडेड कपड़ों से आँका जाता है —
भले ही वो दौलत छल, लूट, या लालच से आई हो।
जो ऐसा सोचते हैं, वे इंसान नहीं — रावण की छाया हैं।
भारत — केवल देश नहीं, देवभूमि है
भारत की आत्मा सिर्फ़ भौगोलिक नहीं, आध्यात्मिक है।
यहाँ जन्म लेने वाला हर जीव, चाहे किसी भी जाति, धर्म, पंथ का हो — एक उच्च चेतना का हिस्सा होता है।
भले अंग्रेजों ने इसे India कहा, पर India भी अर्थ देता है — “Land of God”।
यहाँ नदी भी माँ होती है, मिट्टी भी पूज्य, और मृत्यु भी मोक्ष की सीढ़ी।
सच ये है — ज़िंदगी सिखाने आती है, हम परीक्षा लेने लगते हैं।
हम खुद को सुधारने की बजाय, दुनिया को बदलने लगते हैं।
हम खुद के संघर्षों को ‘संवेदना’ नहीं, ‘श्राप’ मान लेते हैं।
हम जीवन को समझने की बजाय, बस जीने की दौड़ में लगे रहते हैं।
ज़िंदगी एक स्कूल है — जहाँ हर दिन एक पीरियड है।
कुछ लोग किताबें लेकर आते हैं, कुछ अनुभव।
कुछ कक्षा में बैठते हैं, कुछ मंच पर चढ़ जाते हैं।
पर अंत में पास वही होता है —
जो विनम्र रहता है, जो सीखता है, और जो अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकारता है।
