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“शादी का नया प्रोटोकॉल: क्या रिश्ते अब नोटिस पर निर्भर हैं?”

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शादी का नया प्रोटोकॉल: ?

हाल ही में सोशल मीडिया और अख़बारों में एक विचित्र लेकिन चिंतन योग्य घटना सुर्खियों में रही—एक युवक ने अपनी शादी की सार्वजनिक घोषणा करते हुए बाकायदा विज्ञापन निकाला:
“मैं पिंकी से शादी करने जा रहा हूं, किसी प्रेमी को एतराज़ तो नहीं?”

यह वाकया जितना हास्यास्पद दिखता है, उतना ही सामाजिक विमर्श के लिए गंभीर भी है। सवाल यह नहीं है कि किसी को आपत्ति है या नहीं, सवाल यह है कि आज का युवा अपने निजी फैसलों में भी सार्वजनिक स्वीकृति क्यों तलाश रहा है?

रिश्तों का बदलता स्वरूप

विवाह पहले एक निजी, पारिवारिक और संस्कार आधारित संस्था मानी जाती थी। लेकिन आधुनिकता की अति, रिश्तों की अस्थिरता और डिजिटल युग की पारदर्शिता ने इस संस्था को भी संदेह और स्पष्टीकरण के घेरे में ला खड़ा किया है।
अब युवक-युवतियाँ, शादी के पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका अतीत कहीं उनका वर्तमान और भविष्य बर्बाद न कर दे।

यह मनोदशा केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक भी है। यह बताता है कि आज का समाज विश्वास से नहीं, आशंकाओं से संचालित हो रहा है।

प्रेम, विवाह और सार्वजनिक घोषणाएँ

कभी प्रेम पत्र छुपा कर लिखे जाते थे, अब “पूर्व प्रेमियों” को नोटिस देकर कहा जाता है:
“यदि कोई आपत्ति हो तो सात दिन में प्रस्तुत करें!”

यह लोकतंत्र की भावना का सबसे अजीब प्रयोग है — जहाँ भावनाओं पर भी जन-आपत्ति की प्रक्रिया लागू हो गई है।
यह पूछना आवश्यक हो गया है कि क्या शादी अब विवाह है या कोई सिविल केस? क्या दूल्हा किसी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजर रहा है?

रिश्तों में पारदर्शिता या असुरक्षा?

इस तरह की सूचनाएँ यह दिखाती हैं कि आज का युवा भावनात्मक रूप से कितनी असुरक्षा में जी रहा है।
शादी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय से पहले वह इतना चिंतित है कि कहीं अतीत का कोई सिरा आकर वर्तमान की गांठ न खोल दे।

लेकिन क्या यह पारदर्शिता है या सामाजिक दबाव में लिया गया एक अजीब फैसला?
कहीं यह हमारे सामाजिक रिश्तों की विफलता तो नहीं, जिसमें संवाद और closure की जगह नोटिस और समय-सीमा ने ले ली है?

मीडिया और समाज की भूमिका

यह भी सोचने का विषय है कि इस तरह के विषय जब अख़बारों में ‘वायरल खबर’ बन जाते हैं, तो हम एक गंभीर मानसिक स्थिति को भी मज़ाक बना देते हैं।
समाज में वास्तविक संवाद, भावनात्मक समझ और परिपक्वता की ज़रूरत है — न कि नोटिस बोर्ड पर रिश्ते दर्ज करने की।
हमें किस ओर जाना है?

इस पूरी घटना को महज़ हास्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह संकेत है कि आज का समाज रिश्तों को लेकर कितना अस्थिर, कितना भयभीत और कितना औपचारिक होता जा रहा है।

शायद अब ज़रूरत है कि हम फिर से रिश्तों को “संवेदनाओं” से जोड़ें, “सूचनाओं” से नहीं।
प्रेम, त्याग, संवाद और भरोसा — यही वो मूल्य हैं जो विवाह की नींव बनाते हैं।
वरना एक दिन ऐसा आएगा जब शादी से पहले “RTI” डालकर पूछा जाएगा:
“क्या आप निश्चित हैं कि आप किसी और से प्यार नहीं करते थे?”

लेखक: संपादकीय टीम loktoday विषय: बदलते रिश्ते और सामाजिक असमंजस
(यह लेख विमर्श के लिए है, किसी व्यक्ति या संस्था को लक्षित नहीं करता)

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