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सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा रद्द होगी या नहीं : सियासत का नया अखाड़ा!

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हेमराज तिवाड़ी वरिष्ठ पत्रकार

आज रात 8 बजे जब देश के लाखों युवाओं की निगाहें सरकार और न्यायपालिका पर टिकी थीं, तब एक सच्चाई सामने आई — सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा रद्द नहीं होगी। लेकिन यह केवल परीक्षा का मसला नहीं है, यह एक पूरे तंत्र की विफलता और राजनीतिक नौटंकी का आइना बन चुका है। अब यह मुद्दा सिर्फ बेरोजगार युवाओं का नहीं रहा, यह राजनीतिक दलों के लिए एक नया अखाड़ा बन चुका है।

1. परीक्षा नहीं रद्द होगी — पर भरोसा रद्द हो चुका है!

परीक्षा चाहे रद्द न हो, लेकिन उस पर से भरोसा जरूर टूट चुका है। छात्रों को विश्वास था कि यदि पेपर लीक, धांधली, या अनुचित साधनों की पुष्टि होगी, तो न्याय मिलेगा। परन्तु जब निर्णय आया, तो युवाओं ने महसूस किया कि प्रणाली तो चल रही है, पर पारदर्शिता दम तोड़ रही है।

2. सियासत का सुनहरा मौका: हर पार्टी ने इसे ‘कैश’ किया

हर पार्टी इस मौके को अपने हित में भुनाने में लग गई है:

सत्ताधारी दल खुद को न्यायिक व्यवस्था का पक्षधर बताते हुए कहेगा, “कानून ने सही फैसला दिया।”

विपक्षी दल इसे युवाओं के साथ धोखा बताकर प्रदर्शन की रोटी सेंकेंगे।

कुछ नेता इसे जातिगत या क्षेत्रीय रंग देकर समर्थन की दुकान खोलेंगे।

लेकिन छात्र पूछ रहे हैं: “हमारे भविष्य की बोली क्यों लग रही है?”

3. अदालत से भी उम्मीदें अधूरी क्यों रह जाती हैं?

भ्रष्टाचार के साक्ष्य, स्टिंग ऑपरेशन, मीडिया रिपोर्ट — सबके बावजूद न्यायपालिका का यह कहना कि परीक्षा रद्द नहीं की जाएगी, युवाओं के मन में न्याय के प्रति आशंका भरता है। क्या यही ‘न्याय’ है, जिसमें न्याय केवल काग़ज़ी रह जाता है और इंसाफ सिर्फ़ किताबों में?

4. व्यवस्था बनाम व्यवस्था के भीतर की साजिश

आज की युवा पीढ़ी देख रही है कि:

सिस्टम के भीतर ही पेपर लीक माफिया,

जांच एजेंसियों की धीमी कार्रवाई,

और नेताओं की खामोशी या दोहरे बयान —
एक ऐसी गठजोड़ को जन्म दे रहे हैं, जिसमें परीक्षा पास करने से ज़्यादा जरूरी हो गया है सिस्टम को समझना।

5. छात्र आंदोलन और जन आक्रोश की आहट

हालांकि परीक्षा रद्द नहीं हुई, पर यह तय है कि यह निर्णय युवाओं को आंदोलित करेगा। जिस तरह से बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में छात्र आंदोलनों ने इतिहास रचा है, वैसा ही कुछ इस बार भी हो सकता है। युवाओं की चेतना को अब और ज्यादा राजनीतिक हथियार नहीं बनने देना चाहिए।

6. समाधान क्या है?

सभी भर्ती परीक्षाओं को NTA जैसे एक केंद्रीय स्वतंत्र निकाय के तहत लाना।

पेपर लीक पर फास्ट ट्रैक अदालतें चलाना।

दोषियों को सिर्फ़ जेल नहीं, आजीवन प्रतिबंध देना।

परीक्षा प्रणाली में ब्लॉकचेन तकनीक जैसी नई तकनीकों का उपयोग।

परीक्षा रद्द नहीं होगी — यह केवल एक सूचना नहीं, बल्कि एक सत्ता, व्यवस्था और राजनीति का संयुक्त बयान है। इसमें हारता सिर्फ छात्र है, और जीतती है राजनीति।

लेकिन याद रखिए, जब छात्र की कलम हथियार बनती है, तो सत्ता की चूलें हिल जाती हैं। अब वक्त आ गया है कि युवा राजनीति का शिकार न बने, बल्कि प्रणाली का सुधारक बने।

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