कोचिंग माफिया के खिलाफ बयान देना पड़ गया धनखड़ को भारी
राजस्थान के दोनों नेताओं में जारी था युद्ध
किसान मुद्दों को जोर-जोर से उठाना, कई मुद्दों पर सरकार को घेरना
महेश झालानी
जयपुर । राजनीति के गलियारों से खबर आई है कि जगदीप धनखड़ को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की नाराजगी के चलते उप राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा । राजस्थान के होते हुए भी दोनो में जबरदस्त तनाव था । इसकी परिणीति धनखड़ के इस्तीफे से हुई । पिछले कई महीनों से धनखड़ को हटाने के लिए बिड़ला सक्रिय थे । आखिरकार उन्हें कामयाबी हासिल हो ही गई ।
कोटा, जो कभी भारत की शैक्षणिक राजधानी कहा जाता था । अब आत्महत्या और लालच के अंधेरे धब्बों से जूझ रहा है। इस अंधेरे को और गहरा कर दिया भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के उस तीखे बयान ने, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि “कोचिंग संस्थान अब लूट और आत्महत्या के केंद्र बन चुके हैं।” यह बयान सिर्फ एक सामाजिक पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं था, यह सीधा हमला था लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की राजनीतिक और व्यक्तिगत ज़मीन पर । बिड़ला इसी कोटा से सांसद हैं और वर्षों से यहां के कोचिंग उद्योग के ‘रक्षक’ और ‘प्रशासक’ माने जाते हैं। बताया जाता है कि कई कोचिंग संस्थाओं में उनका “संरक्षण” हासिल है ।
धनखड़ का बयान अप्रत्याशित नहीं था। कोटा में बढ़ती आत्महत्याएं, छात्रों पर अत्यधिक दबाव, और कोचिंग सेंटरों की बेलगाम कमाई लंबे समय से मीडिया की सुर्खियां बनते रहे हैं। लेकिन जब देश के दूसरे सबसे ऊंचे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ने मंच से यह कहा कि “यहां संस्थान पैसे कमाने की मशीन बन चुके हैं । यहां बच्चों की जान से ज्यादा फीस मायने रखती है ।” निश्चय ही यह कोटा के राजनीतिक और सामाजिक मानस को झकझोर देने वाला बयान था।
हालांकि, बिड़ला ने इस पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन संसदीय गलियारों और भाजपा के राजस्थान खेमे में यह चर्चा फैल गई कि यह बयान महज़ सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक जानबूझकर रचा गया राजनीतिक ‘स्नाइपर अटैक’ था। एक ऐसा हमला जो ओम बिड़ला की कोटा में दशकों की मेहनत और छवि को धूमिल करने के लिए किया गया।
बिड़ला लंबे समय से कोटा के कोचिंग इंडस्ट्री के समर्थक रहे हैं । उन्होंने कई सुधार की कोशिशें कीं, लेकिन उन्होंने कभी इस पूरे मॉडल को सार्वजनिक रूप से कटघरे में नहीं खड़ा किया। ऐसे में जब धनखड़ ने कोचिंग व्यवस्था को ‘लूट का बाजार’ कहा, तो यह हमला बिड़ला के सियासी वजूद पर सीधा प्रहार बन गया।
यह विवाद यहीं नहीं रुका। इसके बाद संसद सत्रों के दौरान दोनों नेताओं के बीच तल्खी साफ देखी गई। धनखड़ की अध्यक्षता में राज्यसभा और बिड़ला की अगुआई वाली लोकसभा के संचालन में स्पष्ट असहमतियाँ उभरने लगीं। विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए “माइक बंद करने” के आरोपों पर जब दोनों ने एक ही दिन प्रतिक्रिया दी, तो वह भी एक अघोषित प्रतिस्पर्धा का हिस्सा लगा। दोनों ने एक-दूसरे की शैली को बिना नाम लिए कटघरे में खड़ा किया । बिड़ला ने तकनीकी सफाई दी, जबकि धनखड़ ने इसे ‘राजनीति का मंच बनाने’ की निंदा की।
धनखड़ के इस बयान के बाद कोटा के कोचिंग सेंटर्स की प्रतिष्ठा को भारी झटका लगा। छात्रों और अभिभावकों में असुरक्षा की भावना बढ़ गई। कई स्थानीय व्यापारियों और संस्थानों ने इसे कोटा की छवि पर हमला कहा, वहीं कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे ‘सच बोलने की हिम्मत’ बताकर सराहा।
सूत्र बताते हैं कि पार्टी के भीतर भी इस बयान को लेकर असहजता थी। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “धनखड़ जानते थे कि वे क्या कह रहे हैं और कहां कह रहे हैं। कोटा जाकर यह कहना कोई संयोग नहीं था।” उन्होंने कोचिंग संस्थाओं की आड़ में ओम बिड़ला पर जानबूझकर हमला किया । इस बयान के युद्ध की शुरुआत होगई ।
इस विवाद का असर केवल बिड़ला और धनखड़ तक सीमित नहीं रहा । राजस्थान सरकार, हाईकोर्ट, और केंद्र सरकार पर कोटा की कोचिंग व्यवस्था को लेकर अब भारी दबाव है। हाल ही में राजस्थान हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि केंद्र द्वारा कोचिंग संस्थानों के लिए जारी की गई गाइडलाइन्स को विधेयक पारित होने तक प्रभावी माना जाए। यह आदेश भी इसी विवाद से उपजे सार्वजनिक दबाव का परिणाम है।
बहरहाल, धनखड़ का यह बयान सिर्फ एक ‘सामाजिक चिंता’ नहीं था। यह एक ऐसा राजनीतिक धमाका था, जिसकी गूंज सिर्फ कोटा की सड़कों पर नहीं, बल्कि दिल्ली के सियासी गलियारों में भी महीनों तक सुनाई देती रही। और ओम बिड़ला की चुप्पी जो अब भी कई सवालों को जन्म देती है। क्या यह चुप्पी आत्मसम्मान की थी या रणनीतिक मजबूरी की? क्या कोचिंग उद्योग के भीतर का सड़ांध अब सार्वजनिक सड़ांध बन चुका है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या धनखड़ का यह बयान उन्हें ‘सत्ता की छाया’ से बाहर कर गया?
इन सवालों के जवाब आने बाकी हैं, लेकिन इतना तो तय है—कोटा अब सिर्फ परीक्षा की राजधानी नहीं, राजनीति की प्रयोगशाला भी बन चुका है। हकीकत में देखा जाए तो कोटा के एक दीक्षात समारोह में धनखड़ द्वारा दिये बयान के बाद युद्ध का शंखनाद हो चुका था । बिड़ला विशुद्ध भाजपाई और आरएसएस की विचारधारा से ताल्लुक रखते है । जबकि धनखड़ की कोई राजनीतिक विचारधारा है ही नही ।
हकीकत यह है कि धनखड़ विशुद्ध रूप से अवसरवादी और “ओपीआई” यानी अपोर्चुनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्य है । सत्ता के लिए जनता पार्टी, लोकदल, कांग्रेस और बीजेपी का दामन थामा । कभी जरूरत पड़ी तो वे आरएलपी, आप, अकाली या टीएमसी तक का दामन थामने कतई हिचकिचाएंगे नही । क्योकि सत्ता का सुख भोगना उनकी पहली प्राथमिकता है । राजनेता के अलावा वे एक मंजे हुए कलाकार भी है । सहानुभूति बटोरने के लिए वे टसुए बहाने में पीछे नही रहे है और भविष्य में रहेंगे ।