“सेल्फी के शिकार और जया बच्चन का गुस्सा – मोबाइल का कैमरा जैसे तलवार”
हेमराज तिवारी
आज फिर वही हुआ, जिसका अंदाज़ा लगभग हर तीसरे महीने हो जाता है—जया बच्चन गुस्से में।
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक साहसी युवक बिना अनुमति उनकी ओर मोबाइल तानकर आगे बढ़ा, जैसे कोई ‘देश का सबसे ज़रूरी काम’ वही करने जा रहा हो—सेल्फी लेना।
और फिर हुआ वो, जिसे आजकल हम “वायरल मोमेंट” कहते हैं—जया बच्चन का सीधा, बेधड़क धक्का।
सेल्फी संस्कृति – एक नयी महामारी
आज का जमाना ऐसा है कि लोग भोजन से पहले नहीं, सेल्फी से पहले सोचते हैं। सड़क पर हादसा हो जाए, मदद करने से पहले लोग कैमरे ऑन करते हैं। और सेलिब्रिटी दिख जाए, तो अनुमति शब्द का मतलब डिलीट कर देते हैं।
मोबाइल कैमरा हाथ में आते ही कुछ लोग खुद को ‘फोटो जर्नलिस्ट’ और दूसरों को ‘संपत्ति’ समझने लगते हैं।
जया बच्चन का ‘गुस्सा ब्रांड’
मानना पड़ेगा, जया जी का गुस्सा उतना ही पहचानने योग्य है जितना अमिताभ बच्चन की गहरी आवाज़। फर्क बस इतना है कि बिग बी का बारिटोन मोह लेता है और जया जी का धक्का हिला देता है।
लोग कहते हैं—“इतनी मशहूर हैं, तो थोड़ा मुस्कुरा कर टाल देतीं।” पर सवाल ये है—मशहूरी का मतलब क्या हर समय बिन मांगे फोटो खिंचवाने की मजबूरी है?
शिष्टाचार बनाम सोशल मीडिया की भूख
सेल्फी लेने वाले साहब को शायद लगा होगा कि फोटो के बाद व्हाट्सऐप स्टेटस में लिख देंगे—“भेंट हुई जया बच्चन से।” पर असलियत ये है कि बिना पूछे किसी के पास जाकर कैमरा घुसाना भेंट नहीं, घुसपैठ है।
आज सोशल मीडिया के लाइक और फॉलोअर्स के चक्कर में लोग दूसरों के निजी दायरे को ऐसे तोड़ते हैं जैसे वह सरकारी फुटपाथ हो।
धक्का – एक सामाजिक संदेश
जया बच्चन का यह धक्का सिर्फ एक आदमी को नहीं, बल्कि इस पूरी आदत को था—जहाँ ‘क्लिक’ शिष्टाचार से बड़ा हो गया है। शायद उन्होंने बिना भाषण दिए हमें यह बता दिया कि
“हर चेहरे का पासवर्ड नहीं होता, कुछ चेहरों को देखने के लिए अनुमति चाहिए।”
