लोक टुडे न्यूज नेटवर्क हेमराज तिवारी
मोक्ष संस्कार का वेदगामी दृष्टिकोण : पुनर्परिभाषा की आवश्यकता?
भारतीय समाज में सदियों से यह धारणा प्रचलित रही है कि मोक्ष की प्राप्ति केवल पुत्र के माध्यम से ही संभव है। “पिण्डदान”, “तर्पण” और “श्राद्ध” जैसी क्रियाएँ पुत्र-कर्तव्य से जुड़ी बताई गईं। परिणामस्वरूप पुत्र को आवश्यक मानकर कन्या का अवमूल्यन किया गया। परंतु जब हम वेदों और उपनिषदों का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं, तो सत्य एकदम भिन्न रूप में प्रकट होता है।
मोक्ष का वास्तविक आधार
वेदों में मोक्ष (मुक्ति) को किसी बाहरी कर्मकाण्ड पर आधारित न मानकर, आत्मा की शुद्धि, सत्कर्म, ब्रह्मज्ञान और ईश्वर-उपासना पर आधारित बताया गया है।
यजुर्वेद (40.15) कहता है—
“अग्ने नय सुपथा…”
इसका अर्थ है— “हे अग्नि! हमें शुभ मार्ग पर ले चलो, हमारे पाप को दूर करो।”
यहाँ कहीं भी “संतान” को मोक्ष का आधार नहीं माना गया।
पुत्र-पुत्री समान भूमिका
ऋग्वेद (10.85.46) : “समानं व्रता अनुजानता उभे” — स्त्री और पुरुष दोनों धर्म में समान भागीदार हैं।
अथर्ववेद (14.1.20) : “पुत्री वा पुत्रवत्सदा भवति” — पुत्री को पुत्र के समान ही मान्यता दी गई है।
इसका सीधा अर्थ है कि पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध संस्कार केवल पुत्र ही नहीं, पुत्री भी कर सकती है।
पिण्डदान और तर्पण का उद्देश्य
पिण्डदान : शरीर त्यागने वाली आत्मा के लिए अन्न और जल अर्पण, ताकि वह सूक्ष्म शरीर में तृप्ति का अनुभव कर सके।
तर्पण : जल अर्पण कर पितरों को संतुष्ट करने की वैदिक प्रक्रिया।
ताशगात्र (तशगात्र) : शरीर के अंग-प्रत्यंग का प्रतीकात्मक संस्कार, जिससे आत्मा के पुनरुत्थान का मार्ग सुगम हो।
इन सबका मूल उद्देश्य है— श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मिक शांति।
भ्रांति और सुधार की आवश्यकता
बाद के ग्रंथों और समाज ने “मोक्ष केवल पुत्र से ही संभव है” जैसी धारणा बनाई। इसी कारण कन्या जन्म को दुर्भाग्य समझा गया। परंतु वेदों में पुत्र-पुत्री का कोई भेद नहीं है।
यदि बेटियाँ वेदसम्मत पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध करती हैं तो उतना ही प्रभाव होता है जितना पुत्र द्वारा।
वैदिक समाज के लिए संदेश
आज आवश्यकता है कि हम “मोक्ष संस्कार” को पुनर्परिभाषित करें और इसे वेदगामी (Vedic-oriented) स्वरूप दें।
मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान, कर्म और भक्ति से होगी।
पिण्डदान, तर्पण और ताशगात्र स्मरण और कृतज्ञता के प्रतीक हैं, जो पुत्री-पुत्र किसी के भी द्वारा किए जा सकते हैं।
समाज को “पुत्र ही मोक्षदायी है” जैसी भ्रांति से मुक्त करना होगा।
मोक्ष किसी संतान पर आधारित न होकर, स्वयं की साधना, ईश्वर-भक्ति और धर्मपालन पर आधारित है। यदि केवल पुत्री ही है, तो वह पिता की इच्छाओं के अनुरूप सभी वैदिक संस्कार कर सकती है। वेदों का यही स्पष्ट और प्रमाणिक संदेश है।
यह @ भी, जिससे समाज में यह जागरण फैल सकता है कि मोक्ष के द्वार सबके लिए समान रूप से खुले हैं।
