मेरी ट्रैवल डायरी से
कंटेंट : राखी जैन वरिष्ठ पत्रकार
फोटो : योगेश शर्मा- वरिष्ठ फोटोजनर्लिस्ट
सोनार किला: रेत में गढ़ा स्वर्णिम गौरव
जैसलमेर के किले को ‘सोनार किला’ कहा जाता है, यानी स्वर्ण दुर्ग। यह नाम यूं ही नहीं पड़ा। यह किला जिस पीले बलुआ पत्थर से बना है, वह सुबह की रोशनी में ऐसा लगता है मानो किला नहीं, कोई सोने का महल हो। धूप के साथ इसका रंग बदलता है — कभी हल्का पीला, कभी सुनहरा, और कभी रेत सा तपता हुआ। यही इसकी सबसे पहली और अनूठी पहचान है, जो दूर से आते हुए यात्रियों को सम्मोहित कर लेती है।

सोनार किले का निर्माण 1156 ईस्वी में रावल जैसल ने कराया था। यह त्रिकूट पर्वत पर स्थित है — एक पहाड़ी जो थार के समंदर जैसी रेत के बीच अचानक सिर उठाती है और उस पर ये किला, एक अभेद्य प्रहरी की तरह खड़ा है। लगभग 1500 फीट की ऊंचाई पर बना यह दुर्ग लगभग ढाई किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है, और खास बात ये है कि आज भी इसके भीतर करीब 3,000 लोग बसते हैं। ये बात भारत के किसी भी अन्य किले को विशिष्ट नहीं, विलक्षण बनाती है — क्योंकि यह आज भी एक जीवंत किला है।
जैसलमेर का किला एक समय में व्यापारिक कारवांओं का प्रमुख पड़ाव हुआ करता था। अरब देशों से लेकर अफगानिस्तान और पंजाब तक के व्यापारी यहां रुकते, सौदे करते, और फिर आगे बढ़ते। इसी व्यापारिक समृद्धि ने जैसलमेर को वैभवशाली बनाया और उसी समृद्धि की चमक इस किले की दीवारों में महसूस होती है। इसकी ऊँची बुर्जियाँ, पत्थरों में उकेरी गई बारीक जालियाँ, और अंदर बसे मंदिर व महल — सभी इतिहास के साथ-साथ जीवन की निरंतरता का प्रतीक हैं।
किले के भीतर प्रवेश करते ही जैसे समय पीछे की ओर दौड़ता है।
यहाँ का राजमहल, जिसे ‘राजमहल परिसर’ कहते हैं, जैसलमेर के शासकों का निवास हुआ करता था। आज भी उसकी दीवारों पर बने चित्र और नक्काशियां रावल जैसल से लेकर मेहराबों तक की कहानियाँ कहती हैं। मंदिरों की श्रृंखला में सबसे प्रमुख हैं — जैन मंदिर। ये मंदिर 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच बने और इनकी वास्तुकला इतनी महीन और विस्तृत है कि पत्थरों पर उंगलियों की हर रेखा उकेरी सी लगती है। भीतर जाने पर वह शांति मिलती है, जो केवल भक्ति और स्थापत्य के संगम से उपजती है।
सोनार किला केवल स्थापत्य का आश्चर्य नहीं,
वह जैसलमेर के जनजीवन का हिस्सा भी है। किले की गलियाँ आज भी जीवंत हैं — जहाँ कारीगर अपने काम में व्यस्त हैं, दुकानें सजी हैं, बच्चे खेल रहे हैं, और कहीं-कहीं कोई बुजुर्ग पीतल के बर्तन पर कूट-पीट कर ध्वनि में परंपरा ढाल रहा है। यहाँ हर मोड़ पर कोई कथा छुपी है, हर दीवार कुछ कहना चाहती है।
लेकिन इस जीवंतता के बीच, सोनार किले में एक अजीब सी खामोशी भी है —
जैसे हर पत्थर को अपनी जगह पर सदियों से खड़ा रहने की तसल्ली हो। यह खामोशी, यह स्थायित्व ही राजस्थान की असली पहचान है। रणभूमियों के उस गौरव को भी यह किला संजोए हुए है, जो जैसलमेर के इतिहास में कई बार दोहराया गया। मल्लियों के हमलों से लेकर मुग़ल आक्रमण तक, सोनार किला हर चुनौती के आगे सीना ताने खड़ा रहा।
किले के ऊपरी भाग से जब आप जैसलमेर शहर को देखते हैं, तो लगता है जैसे समय कोई किताब बन गया हो, जिसके पन्ने पीले हैं, लेकिन अक्षर अब भी ताजे हैं। दूर तक फैला रेत का समंदर, ऊँटों की कतारें, और छोटे-छोटे मकान, जो उसी बलुआ पत्थर से बने हैं जिससे किला — यह दृश्य केवल देखने के लिए नहीं, भीतर तक महसूस करने के लिए होता है।
जैसलमेर का सोनार किला, यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में नहीं है —
लेकिन इसके भीतर जो जीवन, संस्कृति और इतिहास एक साथ चलते हैं, वह किसी भी विश्व धरोहर से कम नहीं। यह किला एक उदाहरण है कि विरासत केवल पत्थरों में नहीं, उस जीवन में है जो उसमें निरंतर बहता रहे।
Lensman योगेश शर्मा की तस्वीरों में यह अनुभूति और भी गहराती है। उनकी कैमरे की नजर जैसे पत्थर में दर्ज गाथाओं को खींच लाती है। सूर्यास्त के समय जब किले की बुर्जियां लालिमा से नहाती हैं, और मंदिरों के शिखर छाया बनाकर सागर की तरह बहते आसमान में विलीन हो जाते हैं, तो वो क्षण अनंत हो जाता है। योगेश शर्मा की तस्वीरें सिर्फ दृश्यों को नहीं, भावनाओं को कैद करती हैं। और जब आप उन्हें देखते हैं, तो लगता है जैसे आपने उस पल को जिया है।
मेरे लिए सोनार किला केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत अनुभव बन गया। वहाँ की हवा में रेत के साथ गाथाओं की सुगंध है, वहाँ की दीवारों में नारी की पीली ओढ़नी की परछाईं है, वहाँ के मंदिरों में मौन मंत्र हैं, और वहाँ की गलियों में चलती पगडंडियाँ भविष्य को वर्तमान से जोड़ती हैं।
जब मैंने उस किले से नीचे उतरते हुए आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा, तो लगा जैसे किला मुझे विदा नहीं, आमंत्रण दे रहा हो — कि वापस आना, क्योंकि हर बार यहाँ कुछ नया मिलेगा।