लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
चार बार विधायक, एक बार सांसद; पंडित रामकिशन का सियासी सफर सत्ता से संघर्ष और जनसेवा की मिसाल
नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता
राजनीति में बहुत से नेता चुनाव जीतकर पहचान बनाते हैं, कुछ मंत्री और सांसद बनकर इतिहास में जगह पाते हैं। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं, जिनकी पहचान पदों से आगे बढ़कर उनके विचारों, संघर्ष और सार्वजनिक जीवन में निभाई गई भूमिका से बनती है। भरतपुर के पंडित रामकिशन ऐसे ही नेताओं में गिने जाते हैं। चार बार विधायक और एक बार सांसद रहे रामकिशन ने समाजवादी विचारधारा के साथ लंबा राजनीतिक सफर तय किया। उम्र के सौ वर्ष पार करने के बाद भी जनहित के मुद्दों पर उनकी सक्रियता और सरकारों को पत्र लिखकर सवाल उठाने की प्रवृत्ति उन्हें चर्चा में बनाए रखती है।
गांव की मिट्टी से निकले, समाजवादी आंदोलन का चेहरा बने
पंडित रामकिशन का जन्म 28 मार्च 1926 को राजस्थान के भरतपुर जिले की वैर तहसील के मूड़िया ललिता गांव में हुआ था। हालांकि कुछ पुराने अभिलेखों में उनकी जन्मतिथि अलग दर्ज है। उनके पिता का नाम भोलेराम था। उनकी शुरुआती शिक्षा भरतपुर में हुई और उन्होंने आगे की पढ़ाई इलाहाबाद बोर्ड से पूरी की। चुनावी हलफनामे में उनकी शैक्षणिक योग्यता हाईस्कूल दर्ज है।
विद्यार्थी जीवन से ही उनका झुकाव सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन की ओर हो गया था। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौर ने उनके राजनीतिक विचारों को दिशा दी। खादी और गांधीवादी जीवनशैली के साथ समाजवादी चिंतन उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बना। आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी विचारकों की राजनीति से वे प्रभावित रहे।
उनके लिए राजनीति केवल चुनाव लड़ने या पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि सामाजिक बदलाव और जनहित की आवाज उठाने का रास्ता बनी।

1958 में समाजवादी पार्टी की जिम्मेदारी, 1962 में पहली बड़ी चुनावी जीत
पंडित रामकिशन के राजनीतिक जीवन में वर्ष 1958 महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दौर में उन्होंने राजस्थान में समाजवादी संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी संभाली। 1958 से 1962 तक राजस्थान सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है।
वर्ष 1962 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने वैर सीट से संयुक्त समाजवादी दल के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की। इसके बाद 1967 और 1972 में भी वैर से विधानसभा पहुंचे। लगातार तीन चुनावों में जीत ने उन्हें भरतपुर जिले की राजनीति में मजबूत पहचान दिलाई।
यह वह दौर था, जब कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव व्यापक था। इसके बावजूद समाजवादी विचारधारा के आधार पर चुनाव जीतना उनके संगठनात्मक प्रभाव और क्षेत्र में जनसंपर्क को दर्शाता है।
विधानसभा से संसद तक: 1977 में राजबहादुर को हराकर पहुंचे लोकसभा
पंडित रामकिशन के राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव रहा। आपातकाल के बाद हुए इस चुनाव में उन्होंने भरतपुर संसदीय क्षेत्र से भारतीय लोकदल के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता राजबहादुर को पराजित किया।
इस जीत के साथ वे राजस्थान की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचे। संसद में भी उनकी पहचान तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखने वाले नेता के रूप में बनी। उनकी राजनीतिक यात्रा का यह पड़ाव बताता है कि उनका प्रभाव केवल विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं था।
वर्ष 1990 में वे एक बार फिर विधानसभा चुनाव में उतरे। इस बार जनता दल के टिकट पर भरतपुर विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की। इस तरह वे चार बार विधायक और एक बार सांसद बने।
चुनावी सफर: कब-कब मिली जीत?
पंडित रामकिशन के प्रमुख चुनावी पड़ाव इस प्रकार रहे:
- 1962: वैर विधानसभा सीट से संयुक्त समाजवादी दल के टिकट पर जीत।
- 1967: वैर से दोबारा विधायक निर्वाचित।
- 1972: वैर से लगातार तीसरी बार विधानसभा पहुंचे।
- 1977: भारतीय लोकदल के टिकट पर भरतपुर से लोकसभा चुनाव जीते और राजबहादुर को हराया।
- 1990: जनता दल के टिकट पर भरतपुर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की।
वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में वे भरतपुर से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस के गिरिराज प्रसाद तिवारी से हार गए। बाद में 2008 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर नदबई विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके।
इस तरह उनका राजनीतिक सफर केवल जीत की कहानी नहीं है। इसमें विचारधारा के साथ बने रहने, चुनावी पराजय का सामना करने और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बने रहने के अध्याय भी शामिल हैं।
14 साल तक जिला प्रमुख, गांव-गांव तक बनाया संपर्क
विधानसभा और लोकसभा के अलावा पंडित रामकिशन ने स्थानीय शासन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे भरतपुर जिला परिषद के जिला प्रमुख रहे। विभिन्न प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने करीब 14 वर्षों तक इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया।
जिला प्रमुख के रूप में उनकी पहचान गांवों से सीधे संवाद रखने वाले नेता की रही। स्थानीय समस्याओं, ग्रामीण विकास और आम लोगों की जरूरतों से जुड़ाव उनके राजनीतिक जीवन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल रहा।
यही वजह है कि उनका नाम केवल चुनावी राजनीति के संदर्भ में नहीं, बल्कि भरतपुर के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में भी लिया जाता है।
समाजवादी पार्टी से जुड़ाव: विचारधारा और चुनावी राजनीति का अलग अध्याय
पंडित रामकिशन का मूल राजनीतिक आधार सोशलिस्ट और संयुक्त सोशलिस्ट आंदोलन रहा। बाद के वर्षों में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर भी चुनाव लड़ा। वर्ष 2008 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में वे नदबई सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे और उन्हें 6,332 वोट मिले।
यहां एक बात महत्वपूर्ण है—समाजवादी आंदोलन से उनका जुड़ाव कई दशक पुराना है, जबकि समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर उनकी उम्मीदवारी बाद के दौर की है। दोनों को एक ही समय से शुरू हुआ राजनीतिक संबंध मानना सही नहीं होगा।
उनकी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक दल और चुनावी समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन किसी नेता की मूल विचारधारा उसके सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक दिखाई दे सकती है।
ईआरसीपी से किसानों तक: उम्र बढ़ी, मुद्दों पर आवाज नहीं थमी
पंडित रामकिशन आज भी जनहित के मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए चर्चा में रहते हैं। पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना यानी ईआरसीपी को लेकर उनकी भूमिका का विशेष उल्लेख किया जाता है। वर्ष 2007 से इस मांग को उठाने वाले नेताओं में उनका नाम लिया जाता है।
किसानों की समस्याएं, फसल खराबे का मुआवजा, फसल बीमा, सिंचाई, गांवों में प्रशासनिक सुविधाएं और आम लोगों को सुलभ न्याय जैसे विषयों पर भी वे अपनी बात रखते रहे हैं।
फरवरी 2025 में उन्होंने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र लिखकर किसानों के बकाया मुआवजे, फसल बीमा, ग्राम सचिवालयों की स्थापना और न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने जैसे मुद्दे उठाए थे।
यह उनकी मौजूदा भूमिका को समझने का महत्वपूर्ण उदाहरण है। सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर होने के बावजूद वे सरकारों से सवाल पूछने और जनहित की मांग रखने का रास्ता चुनते हैं।
सभी दलों में सम्मान की वजह क्या है?
पंडित रामकिशन को अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के नेताओं के बीच सम्मान मिलने की चर्चा होती है। इसकी एक वजह उनका लंबा सार्वजनिक जीवन है। उन्होंने विधानसभा, लोकसभा, जिला परिषद और समाजवादी संगठनों में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं।
उनकी राजनीतिक पहचान किसी एक चुनाव या पद से नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों तक फैले राजनीतिक अनुभव से बनी है। वे राजस्थान की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के बाद की राजनीति, कांग्रेस के प्रभुत्व, समाजवादी आंदोलनों, आपातकाल और गठबंधन राजनीति जैसे कई दौर देखे।
मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं को जनहित के मुद्दों पर पत्र लिखना भी उनकी सक्रियता का हिस्सा रहा है। किसी नेता के प्रति सम्मान का आकलन केवल सार्वजनिक बयानों से नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और निरंतर सार्वजनिक उपस्थिति ने उन्हें भरतपुर की राजनीति में विशिष्ट स्थान दिलाया है।
सौ वर्ष की उम्र में भी लोकतंत्र पर भरोसा
अप्रैल 2024 में 99 वर्ष की उम्र में पंडित रामकिशन जयपुर से भरतपुर पहुंचकर मतदान करने गए थे। उन्होंने घर से मतदान की सुविधा के बजाय मतदान केंद्र पर जाकर अपना मताधिकार इस्तेमाल किया। यह प्रसंग उनकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का उल्लेखनीय उदाहरण बना।
मार्च 2026 में उन्होंने जीवन के 101वें वर्ष में प्रवेश किया। इस उम्र में भी सामाजिक और सार्वजनिक मुद्दों पर उनकी रुचि बनी रहना उनके लंबे राजनीतिक जीवन की खास पहचान है।
इनसाइड स्टोरी: पद नहीं, विचारधारा बनी पहचान
पंडित रामकिशन के राजनीतिक जीवन को केवल चार बार विधायक और एक बार सांसद बनने के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उनकी असली कहानी उस दौर से शुरू होती है, जब उन्होंने समाजवादी विचारधारा को अपनाया, संगठन खड़ा किया और चुनावी सफलता के साथ-साथ हार का भी सामना किया।
उन्होंने सत्ता के विभिन्न केंद्रों को करीब से देखा, लेकिन जनहित के मुद्दों पर अपनी बात रखने की भूमिका नहीं छोड़ी। ईआरसीपी से लेकर किसानों की समस्याओं और गांवों में बेहतर प्रशासन की मांग तक, उनका सार्वजनिक हस्तक्षेप जारी रहा है।
भरतपुर की राजनीति में पंडित रामकिशन का महत्व इसी निरंतरता में है। वे उस पीढ़ी के नेता हैं, जिनके लिए राजनीति केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि विचार, संवाद और जनता के प्रति जवाबदेही का विषय भी रही है।
लोक टुडे का निष्कर्ष: पंडित रामकिशन का सफर बताता है कि राजनीतिक जीवन की पहचान केवल पदों की संख्या से तय नहीं होती। विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता, लंबे समय तक जनसरोकारों से जुड़े रहना और उम्र के इस पड़ाव पर भी लोकतांत्रिक सवाल उठाते रहना किसी नेता की सार्वजनिक विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।