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कल्याण सिंह : सत्ता, संघर्ष और सियासत , जो राम मंदिर आंदोलन से राजभवन तक पहुंची

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

नीरज मेहरा पत्रकार 

दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री… अपनी ही पार्टी से बगावत कर अलग राजनीतिक दल खड़ा करने वाले नेता… फिर उसी भाजपा में वापसी कर लोकसभा चुनाव जीतने वाले राजनेता… राजस्थान के राज्यपाल के संवैधानिक पद तक पहुंचने वाले व्यक्तित्व… और अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल नाम—कल्याण सिंह की राजनीतिक कहानी भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव की एक ऐसी दास्तान है, जिसमें सत्ता भी है, संघर्ष भी, बगावत भी और वापसी भी।

कल्याण सिंह का जन्म 1932 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुआ था। सामान्य पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई। छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव ने उनके राजनीतिक संस्कारों को दिशा दी। आगे चलकर भारतीय जनसंघ और फिर भाजपा के साथ उनका रिश्ता मजबूत होता गया।

लेकिन कल्याण सिंह की पहचान केवल भाजपा के नेता के रूप में नहीं बनी। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में पिछड़े वर्गों, गरीबों और आम लोगों के बीच ऐसी पकड़ बनाई, जिसने भाजपा के सामाजिक आधार को भी विस्तार दिया। लोधी समुदाय से आने वाले कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों में प्रभावशाली नेता के तौर पर देखा गया। यही वजह थी कि वे भाजपा के पारंपरिक समर्थक वर्ग से आगे निकलकर व्यापक सामाजिक आधार बनाने में सफल रहे।

अतरौली से शुरू हुई जीत की लंबी कहानी

1967 में अतरौली विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में पहली बार विधानसभा चुनाव जीतने के साथ कल्याण सिंह का सक्रिय चुनावी सफर शुरू हुआ। इसके बाद अतरौली उनकी राजनीतिक पहचान का पर्याय बन गया।

उन्होंने लंबे समय तक इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ा और अधिकांश चुनावों में जीत दर्ज की। 1980 में कांग्रेस के अनवर खान से मिली हार को छोड़ दें तो उनका चुनावी प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा। धीरे-धीरे संगठन में उनका कद बढ़ता गया और वे उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर विधानसभा में पार्टी के नेता तक पहुंचे।

यहीं से कल्याण सिंह का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति के बड़े नेताओं में गिना जाने लगा।

1991 : पहली बार मुख्यमंत्री और सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा

1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहे। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन तेज था और भाजपा तेजी से राजनीतिक ताकत बन रही थी। इसी दौर में कल्याण सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

उनके सामने चुनौती दोहरी थी—एक ओर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासन संभालना, दूसरी ओर अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी भावनाओं और राजनीतिक दबावों का सामना करना।

कल्याण सिंह खुलकर राम मंदिर आंदोलन के समर्थन में खड़े रहे। उनकी सरकार ने अयोध्या में विवादित परिसर से लगी जमीन का अधिग्रहण भी किया। भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ उनकी सक्रियता ने उन्हें आंदोलन के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में ला खड़ा किया।

लेकिन इतिहास ने उनके सामने इससे भी बड़ी परीक्षा रखी थी।

6 दिसंबर 1992 : एक दिन जिसने कल्याण सिंह की राजनीति की दिशा बदल दी

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। देश की राजनीति में यह घटना एक निर्णायक मोड़ साबित हुई।

उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे। उन्होंने पहले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विवादित ढांचे की सुरक्षा का आश्वासन दिया था। लेकिन 6 दिसंबर को कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचे को ढहा दिया।

विध्वंस के बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। केंद्र सरकार ने उसी दिन उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया।

कल्याण सिंह के लिए यह सिर्फ मुख्यमंत्री पद छोड़ने का क्षण नहीं था, बल्कि यही घटना उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान भी बन गई।

समर्थकों के लिए वे ऐसे नेता बने जिसने राम मंदिर आंदोलन के साथ खड़े होने की राजनीतिक कीमत चुकाई। आलोचकों के लिए वे उस प्रशासन के मुखिया थे जिसके कार्यकाल में विवादित ढांचा गिरा। इतिहास में कल्याण सिंह की भूमिका इसी दोहरे राजनीतिक मूल्यांकन के साथ दर्ज हुई।

सत्ता गई, लेकिन राजनीतिक कद बढ़ता गया

1992 के बाद कल्याण सिंह का राजनीतिक सफर खत्म नहीं हुआ। 1993 के चुनाव में उन्होंने अतरौली और कासगंज दोनों सीटों से चुनाव जीता। हालांकि भाजपा सरकार नहीं बना सकी।

1996 के चुनाव के बाद फिर त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी। भाजपा और बसपा के बीच सत्ता साझेदारी का रास्ता निकला। मार्च 1997 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं और समझौते के तहत कुछ महीनों बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला।

कल्याण सिंह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

यह उनका दूसरा कार्यकाल था, लेकिन इस बार चुनौती पहले से अलग थी। सरकार के भीतर सहयोगी दलों का दबाव, सामाजिक समीकरण और बदलती राजनीतिक परिस्थितियां लगातार उनके सामने थीं।

बसपा ने समर्थन वापस लिया तो कल्याण सिंह ने दूसरे दलों और टूटे हुए राजनीतिक गुटों के समर्थन से सरकार चलाने की कोशिश की। लेकिन यह सरकार भी ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रह सकी।

1998 में राज्यपाल रमेश भंडारी द्वारा उनकी सरकार को बर्खास्त किए जाने के बाद राजनीतिक संकट पैदा हुआ। इलाहाबाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उनकी सरकार फिर बहाल हुई।

यह दौर बताता है कि कल्याण सिंह सिर्फ चुनाव जीतने वाले नेता नहीं थे, बल्कि सत्ता के कठिनतम राजनीतिक गणित से लड़ने वाले राजनेता भी थे।

जब कल्याण सिंह ने भाजपा को ही चुनौती दे दी

राजनीति में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब भाजपा के भीतर ही कल्याण सिंह के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा।

पार्टी के भीतर सामाजिक आधार, कानून-व्यवस्था और नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए। 36 भाजपा विधायकों के इस्तीफे और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच केंद्रीय नेतृत्व ने कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया।

लेकिन कल्याण सिंह ने इसे अपनी राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं माना।

उन्होंने भाजपा छोड़ दी और अपनी पार्टी—राष्ट्रीय क्रांति पार्टी—खड़ी कर दी।

यह कदम उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था। वे सत्ता और संगठन के दबाव के आगे पूरी तरह झुकने वाले नेता नहीं माने गए। अपनी राजनीतिक जमीन पर भरोसा करते हुए उन्होंने अलग राह चुनी।

2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी नई पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता।

यानी जिस नेता ने भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई थी, वह फिर भी अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने में सफल रहा।

फिर भाजपा में वापसी—और दोबारा चुनावी ताकत का प्रदर्शन

कल्याण सिंह की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय उनकी वापसी है।

जनवरी 2004 में उन्होंने भाजपा में वापसी की। उन्हें पार्टी की राज्य स्तरीय चुनाव समिति की जिम्मेदारी भी दी गई। इसके बाद उन्होंने बुलंदशहर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया कि भाजपा से अलग होने के बावजूद उनकी राजनीतिक जमीन खत्म नहीं हुई थी।

लेकिन भाजपा के साथ उनका रिश्ता एक बार फिर सहज नहीं रहा।

2009 में उन्होंने पार्टी की सदस्यता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे समाजवादी पार्टी के तत्कालीन नेतृत्व के करीब आए और मुलायम सिंह यादव तथा अमर सिंह से उनके राजनीतिक रिश्ते चर्चा में रहे। उन्होंने 2009 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए प्रचार भी किया।

इसके बाद उन्होंने जन क्रांति पार्टी बनाई और अपने बेटे राजवीर सिंह को सक्रिय भूमिका में आगे किया।

लेकिन राजनीति का चक्र एक बार फिर पूरा हुआ।

2013 में जन क्रांति पार्टी का भाजपा में विलय हुआ और मार्च 2014 में कल्याण सिंह दोबारा भाजपा में लौट आए।

यह वापसी बताती है कि कल्याण सिंह और भाजपा का रिश्ता केवल राजनीतिक दल और नेता का रिश्ता नहीं था—यह वैचारिक और राजनीतिक जुड़ाव का ऐसा संबंध था, जो मतभेदों और अलगाव के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

बड़े नेताओं के साथ रिश्ते और सियासी कद

कल्याण सिंह का राजनीतिक सफर उत्तर प्रदेश की राजनीति तक सीमित नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे अलग-अलग विचारधाराओं और राजनीतिक धाराओं के नेताओं के साथ उनके रिश्ते भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय रहे।

भाजपा में वे आडवाणी और जोशी जैसे नेताओं के साथ राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में रहे। दूसरी ओर, भाजपा से अलग होने के बाद मुलायम सिंह यादव के साथ उनके राजनीतिक समीकरण बने।

यही विरोधाभास कल्याण सिंह की राजनीति को दिलचस्प बनाता है।

वे विचारधारा में स्पष्ट थे, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों से संवाद करने की क्षमता भी रखते थे।

गरीबों और पिछड़ों के बीच बनी अलग पहचान

कल्याण सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका सामाजिक आधार था।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक भाजपा की पहचान मुख्य रूप से सवर्ण मतदाताओं की पार्टी के रूप में की जाती थी। कल्याण सिंह ने पिछड़े वर्गों और ग्रामीण समाज में भाजपा के लिए नया आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी भाषा और राजनीतिक शैली आम आदमी के करीब मानी जाती थी। वे खुद को सत्ता के गलियारों से ज्यादा जमीन की राजनीति से जोड़कर देखते थे।

इसी वजह से समर्थकों के बीच वे गरीबों, पिछड़ों और वंचित वर्गों की आवाज उठाने वाले नेता के रूप में पहचाने गए।

उनकी राजनीतिक ताकत सिर्फ जातीय समीकरणों पर आधारित नहीं थी। संगठन, हिंदुत्व, राम मंदिर आंदोलन और व्यक्तिगत जनाधार—इन सभी का मिश्रण उनके राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करता था।

राजस्थान के राजभवन तक पहुंचा सफर

लंबे राजनीतिक संघर्ष, कई बार पार्टी से अलगाव और फिर वापसी के बाद कल्याण सिंह को 2014 में राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

4 सितंबर 2014 को उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल के रूप में शपथ ली। बाद में उन्हें हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया।

यह उनके राजनीतिक सफर का बिल्कुल अलग पड़ाव था।

जिस नेता ने उत्तर प्रदेश की सड़कों और विधानसभा की राजनीति से अपनी पहचान बनाई थी, वह अब संवैधानिक पद पर पहुंच चुका था।

एक तरफ अतरौली का जमीनी नेता, दूसरी तरफ राजभवन का संवैधानिक प्रमुख—कल्याण सिंह के राजनीतिक जीवन में यह बदलाव अपने आप में असाधारण था।

उन्होंने 2019 में राजस्थान के राज्यपाल का कार्यकाल पूरा किया और इसके बाद फिर सक्रिय राजनीति में लौटे।

राम मंदिर आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरों में एक

कल्याण सिंह का नाम अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन से अलग करके देखना मुश्किल है।

1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार का राम मंदिर आंदोलन के प्रति रुख स्पष्ट था। 6 दिसंबर 1992 की घटना ने उनके नाम को हमेशा के लिए अयोध्या विवाद के इतिहास से जोड़ दिया।

बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े मामलों में उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हुई। अवमानना मामले में उन्हें एक दिन की सजा और जुर्माना भुगतना पड़ा। बाद में आपराधिक मुकदमे में विशेष अदालत ने 2020 में उन्हें और अन्य आरोपियों को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।

इस पूरे दौर में कल्याण सिंह की राजनीतिक छवि और अधिक मजबूत हुई।

राम मंदिर समर्थक राजनीति में वे ऐसे नेता बन गए, जिन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने की कीमत पर भी अपनी राजनीतिक भूमिका को इतिहास में दर्ज करा दिया।

निजी रिश्तों से आगे राजनीतिक विरासत

कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत केवल उनके अपने सफर तक सीमित नहीं रही। उनके बेटे राजवीर सिंह और पोते संदीप सिंह भी राजनीति में सक्रिय रहे।

इस तरह अतरौली से शुरू हुआ एक राजनीतिक सफर आगे चलकर एक राजनीतिक परिवार की विरासत में बदल गया।

लेकिन कल्याण सिंह की सबसे बड़ी विरासत शायद उनकी चुनावी जीत या उनके पद नहीं हैं।

उनकी सबसे बड़ी विरासत है—विपरीत परिस्थितियों में अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखना।

वे मुख्यमंत्री बने, सत्ता से हटे।
पार्टी में रहे, फिर पार्टी से अलग हुए।
अपनी पार्टी बनाई।
चुनाव जीते।
फिर भाजपा में लौटे।
फिर लोकसभा चुनाव जीता।
राजस्थान के राज्यपाल बने।
और अंततः भाजपा की राजनीति में फिर सक्रिय हुए।

आखिरी दौर और विदाई

3 जुलाई 2021 को तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत गंभीर होने पर उन्हें लखनऊ स्थित एसजीपीजीआई में स्थानांतरित किया गया। लंबे उपचार के बाद 21 अगस्त 2021 को 89 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

उनकी मृत्यु के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति के एक ऐसे अध्याय का अंत हुआ, जिसने तीन दशकों से अधिक समय तक भारतीय राजनीति को प्रभावित किया था।

जनवरी 2022 में उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

कल्याण सिंह की इनसाइड स्टोरी का सार

कल्याण सिंह की कहानी को सिर्फ दो बार मुख्यमंत्री बनने या राम मंदिर आंदोलन से जोड़कर देखना उनके राजनीतिक जीवन को छोटा कर देना होगा।

वे उस दौर के नेता थे जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा का सामाजिक आधार बढ़ाने में भूमिका निभाई।

वे पिछड़ों के बीच पहुंचे।
गरीबों के बीच अपनी पहचान बनाई।
राम मंदिर आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े रहे।
मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाई।
पार्टी से टकराव हुआ तो अपनी पार्टी बनाई।
राजनीतिक अलगाव के बाद भी चुनाव जीते।
फिर भाजपा में लौटे।
राजस्थान के राज्यपाल बने।
और जीवन के अंतिम वर्षों तक भाजपा के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे।

कल्याण सिंह की सियासत का सबसे बड़ा संदेश शायद यही था कि राजनीति में पद बदल सकते हैं, पार्टियां बदल सकती हैं, समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन अगर नेता की अपनी जमीन मजबूत हो तो उसका राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।

अयोध्या आंदोलन ने उन्हें इतिहास के सबसे चर्चित राजनीतिक चेहरों में शामिल किया, पिछड़े और गरीब वर्गों में उनकी पकड़ ने उन्हें उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति का महत्वपूर्ण नेता बनाया और भाजपा के साथ उनका रिश्ता उन्हें हिंदुत्व की राजनीति के प्रमुख स्तंभों में ले गया।

कल्याण सिंह चले गए, लेकिन अतरौली से अयोध्या, लखनऊ से जयपुर और भाजपा से बगावत तथा फिर वापसी तक फैली उनकी सियासी यात्रा भारतीय राजनीति की उन कहानियों में दर्ज हो गई, जिनमें सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण है—अपनी राजनीतिक पहचान के लिए लगातार संघर्ष करते रहने का साहस।

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