Home latest *जहां न पहुंचे बैलगाड़ी वहां पहुंच गए मारवाड़ी*

*जहां न पहुंचे बैलगाड़ी वहां पहुंच गए मारवाड़ी*

0
लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
*.. “पीसो हाथ को भाई साथ को”,.. मारवाड़ियों का मूल मंत्र*

.
*जितेन्द्र सिंह शेखावत*
वरिष्ठ पत्रकार रा.प.

” *सदियों* पहले जन्म भूमि और परिवार छोड़कर बंगाल आसाम आदि दूरस्त राज्यों में पहुंच कर व्यापार की जड़े जमाने वाले मारवाड़ियों का आज भी अपने गांवों से जुड़ाव बना हुआ है।
आजादी के आंदोलन में भूमिका निभाने के साथ अपनी जन्म भूमि का विकास कराने में रुचि रखने वाले प्रवासी मारवाड़ियों ने देश के आर्थिक व औद्योगिक ढांचे को मजबूत किया है।
इतिहासकार डा. डी के . टकनेत ने मारवाड़ी इतिहास में लिखा है कि मारवाड़ी ने जिस शहर में कदम रखा उसे निहाल कर दिया ।
पन्द्रहवीं शताब्दी के दौर में आमेर नरेश मान सिंह प्रथम के साथ बंगाल के युद्ध अभियान में राजपूत सेना के लिए भोजन आवास और हथियार का प्रबन्ध करने में शामिल मोदीखाना के मारवाड़ियों ने अपनी छोड़ पहला कदम बंगाल की धरती पर रखा था।
बंगाल विजय के बाद मारवाड़ियों ने मानसिंह के संरक्षण में कारोबार करना शुरु किया था । बाद में उन्होंने शेखावाटी आदि स्थानों से अपने सजातीय भाइयो को बुलवा लिया।
राजस्थान से कमाने निकले कारोबारियों की वहां पर मारवाड़ी के नाम से पहचान मशहूर हुई । राजाओं का इन्हे पूरा सहयोग मिला, लेकिन अकाल, डाकुओं की लूटपाट एवं उधारी की रकम डूबने से परेशान व्यापारी परदेश के लिए कूच करने लगे । मारवाड़ियो के कुशल प्रबन्धन के गुण के चलते
देश की रियासतों में मंत्री, सेनापति, कामदार बनाने के लिए राजाओं ने इन्हे सम्मान से बुलाया ।
उस समय बाहर जाने वालों में इनमें अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल, खंडेलवाल, सरावगी आदि जातियों के लोग प्रमुख थे । उन दिनों पिलानी से ऊंटो पर बैठ अहमदाबाद जाने में बीस दिन और आसाम जाने पर तीन महीने लगते थे। रास्ते में धाड़ेती, लुटेरे भी इन्हे परेशान करते रहते । रास्ते में कईयों की मृत्यु हो जाती और बरसों तक परिवार को भी सूचना नहीं मिलती ।
मारवाडियों का मूल मंत्र था ... “पीसो हाथ को, भाई साथ को” । समूह बनाकर पैदल भी जाते थे। वर्ष 1881 में आसाम में पहुंचे करीब ढाई हजार मारवाड़ी सन् 19 31 में बाइस हजार हो गए थे। । रेलमार्ग शुरु होने के बाद रिश्तेदारों को बुलाना शुरू किया । जयपुर फाऊंडेशन के अध्यक्ष सियाशरण लश्करी के मुताबिक बिड़ला, बजाज, डालमियां, पौद्धार आदि मारवाड़ियों का ढूंढाड के विकास में बड़ा योगदान रहा । के सी मालू ने बताया कि मारवाड़ियो ने अपनी मातृभूमि की बोली और संस्कृति को आज तक बरकरार रख रखा है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version