लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता
मेवाड़ से निकले सीएम तक पहुंचे, सबसे कम कार्यकाल क्यों रहा देवपुरा का
राजस्थान की सियासत में कई मुख्यमंत्री ऐसे हुए, जिन्होंने वर्षों तक सत्ता संभाली। लेकिन एक नाम ऐसा भी है, जिसकी मुख्यमंत्री के रूप में पहचान महज 15 दिन की पारी से बनी। यह नाम था—हीरालाल देवपुरा। मेवाड़ की धरती से निकले देवपुरा ने वकालत से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की, कांग्रेस संगठन में अपनी जगह बनाई, पंचायत समिति के प्रधान रहे, विधायक बने, कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले और विधानसभा अध्यक्ष तक पहुंचे। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली तो वह भी ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच, जब विधानसभा चुनाव सिर पर थे। 23 फरवरी 1985 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले देवपुरा 10 मार्च को पद से हट गए। उनकी जगह हरिदेव जोशी ने मुख्यमंत्री पद संभाला। राजस्थान सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी देवपुरा का कार्यकाल 23 फरवरी से 10 मार्च 1985 दर्ज है।
मेवाड़ की धरती से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
हीरालाल देवपुरा का राजनीतिक सफर मेवाड़ के कुंभलगढ़ क्षेत्र से शुरू होकर राजस्थान की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा। उनका जन्म 1925 में कुंभलगढ़ क्षेत्र के केलवाड़ा में हुआ था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कानून की शिक्षा हासिल की और वकालत को पेशे के रूप में अपनाया।
राजसमंद क्षेत्र में वकालत करते हुए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 1955 में वे राजसमंद बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। राजस्थान विधानसभा के डिजिटल संग्रह में भी उन्हें सादगी, दृढ़ता और ईमानदारी के लिए पहचाने जाने वाला नेता बताया गया है। विधानसभा के आधिकारिक विवरण के अनुसार वे गांधीवादी विचारों से भी प्रभावित थे।
लेकिन देवपुरा की मंजिल सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं थी। वे धीरे-धीरे कांग्रेस संगठन और स्थानीय राजनीति में सक्रिय होते गए। 1959 से 1967 तक कुंभलगढ़ पंचायत समिति के प्रधान रहे और उदयपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी संगठन में भूमिका निभाई।
यानी विधानसभा की चौखट पर पहुंचने से पहले ही उन्होंने संगठन, पंचायत और स्थानीय राजनीति में लंबा अनुभव हासिल कर लिया था।
1967 में पहली बार विधानसभा पहुंचे
वर्ष 1967 में हीरालाल देवपुरा पहली बार राजस्थान विधानसभा पहुंचे। कुंभलगढ़ उनकी राजनीतिक पहचान का प्रमुख केंद्र बना रहा।
इसके बाद उन्होंने 1972 में भी विधानसभा चुनाव जीता। 1977 के बाद एक अंतराल आया और 1980 में उन्होंने फिर वापसी की। 1985 और 1990 में भी वे विधानसभा पहुंचे। 1993 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1998 में एक बार फिर कुंभलगढ़ से विधानसभा पहुंचे।
इस तरह देवपुरा का राजनीतिक जीवन किसी एक चुनाव या एक पद तक सीमित नहीं रहा। वे कई दशकों तक राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहे और कांग्रेस के प्रमुख क्षेत्रीय चेहरों में गिने गए।
विधायक से मंत्री तक, कई अहम विभागों की जिम्मेदारी
विधानसभा पहुंचने के बाद देवपुरा को संगठन और सरकार दोनों में जिम्मेदारियां मिलीं।
उन्होंने पंचायतीराज, पर्यटन, सामुदायिक विकास और आयोजना जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली। आगे चलकर जनसंपर्क, पर्यटन और गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी उनके पास रहे।
इसके बाद उन्हें कैबिनेट स्तर की जिम्मेदारियां मिलीं। सार्वजनिक निर्माण, ऊर्जा, सिंचाई, राजस्थान नहर परियोजना, श्रम और सहकारिता जैसे विभागों से जुड़े कामकाज को उन्होंने संभाला।
1981 के दौर में चिकित्सा, स्वास्थ्य, विधि, न्याय और परिवार कल्याण जैसे विभाग भी उनकी जिम्मेदारियों में शामिल रहे। बाद के वर्षों में खान, भूमि सुधार, राजस्व और श्रम जैसे विभागों का दायित्व भी उन्होंने संभाला।
यानी मुख्यमंत्री बनने से काफी पहले ही देवपुरा राज्य सरकार के कई महत्वपूर्ण विभागों का अनुभव हासिल कर चुके थे।
लेकिन 1985 में उनकी राजनीति ने अचानक ऐसा मोड़ लिया, जिसने उन्हें राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया।
एक घटना ने बदल दिया राजस्थान की राजनीति का समीकरण
1985 में राजस्थान विधानसभा चुनाव होने वाले थे। उस समय शिवचरण माथुर मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही थी।
इसी दौरान भरतपुर के डीग क्षेत्र में एक ऐसी घटना हुई, जिसने राज्य की राजनीति को हिला दिया।
20 फरवरी 1985 को निर्दलीय विधायक और भरतपुर राजघराने से जुड़े राजा मानसिंह ने कथित तौर पर मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के हेलिकॉप्टर को अपनी जीप से टक्कर मार दी। अगले दिन 21 फरवरी को पुलिस मुठभेड़ में राजा मानसिंह की मौत हो गई। घटना को लेकर भारी राजनीतिक और सार्वजनिक आक्रोश हुआ। बाद में मामले की जांच सीबीआई ने की और 2020 में मथुरा की अदालत ने 11 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया।
इस घटनाक्रम का सीधा राजनीतिक असर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर पर पड़ा। उन्होंने 23 फरवरी 1985 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
और यहीं से शुरू होती है हीरालाल देवपुरा के 15 दिन के मुख्यमंत्री बनने की कहानी।
कुंभलगढ़ से सीधे जयपुर बुलाया गया
शिवचरण माथुर के इस्तीफे के बाद कांग्रेस आलाकमान को तत्काल मुख्यमंत्री के लिए एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो उस समय सरकार को संभाल सके और चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ा सके।
हीरालाल देवपुरा उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे और चुनावी गतिविधियों में सक्रिय थे।
उन्हें अचानक जयपुर बुलाया गया।
23 फरवरी 1985 को उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राजस्थान सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक उनका कार्यकाल इसी दिन शुरू हुआ।
मेवाड़ के कुंभलगढ़ से निकला एक नेता अब राजस्थान की सबसे बड़ी राजनीतिक कुर्सी पर था।
लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट अभी बाकी था।
मुख्यमंत्री बने, लेकिन चुनाव सिर पर थे
देवपुरा जिस समय मुख्यमंत्री बने, उस समय विधानसभा चुनाव बेहद करीब थे।
यानी उनके सामने लंबी अवधि की सरकार चलाने के बजाय तत्काल चुनावी परिस्थितियों को संभालने की चुनौती थी।
उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला और कांग्रेस चुनाव मैदान में उतर गई।
चुनाव हुए…
नतीजे आए…
कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला।
स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठा कि जिस नेता ने चुनावी दौर में मुख्यमंत्री के रूप में सरकार संभाली, क्या वही चुनाव के बाद भी मुख्यमंत्री रहेगा?
लेकिन कांग्रेस आलाकमान का फैसला कुछ और था।
15 दिन बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई
चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस ने हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया।
10 मार्च 1985 को हरिदेव जोशी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला। सरकारी रिकॉर्ड में भी इसी तारीख को देवपुरा का कार्यकाल समाप्त और हरिदेव जोशी का कार्यकाल शुरू होना दर्ज है।
इस तरह 23 फरवरी से 10 मार्च 1985 तक हीरालाल देवपुरा राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे।
यानी उनकी मुख्यमंत्री की पारी महज 15 दिन की रही।
राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की सूची में यह सबसे छोटे कार्यकालों में सबसे प्रमुख उदाहरण है। उपलब्ध रिकॉर्ड उनके कार्यकाल को 15 दिन दर्ज करते हैं।
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि देवपुरा का छोटा कार्यकाल उनकी राजनीतिक यात्रा की कमजोरी का संकेत नहीं था। वे एक असाधारण राजनीतिक परिस्थिति में मुख्यमंत्री बनाए गए थे—शिवचरण माथुर के इस्तीफे और चुनावी संक्रमण के बीच एक अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था के रूप में।
मुख्यमंत्री पद गया, लेकिन राजनीतिक कद बरकरार रहा
मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटने के बाद भी देवपुरा का राजनीतिक सफर खत्म नहीं हुआ।
बल्कि उन्हें राजस्थान विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया।
राजस्थान विधानसभा के आधिकारिक डिजिटल संग्रह के अनुसार, देवपुरा ने हरिदेव जोशी के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष का पद संभाला। विधानसभा अध्यक्षों की सूची में उनका कार्यकाल 20 मार्च 1985 से 16 अक्टूबर 1985 तक दर्ज है।
यह भी अपने आप में महत्वपूर्ण था। मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटने के बाद सीधे विधानसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद की जिम्मेदारी मिलना बताता है कि कांग्रेस संगठन में उनका राजनीतिक महत्व बना हुआ था।
1988-89 के दौरान वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।
हार के बाद वापसी भी की
देवपुरा के राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव लगातार रहे।
1993 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार मिली। लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद चुनावी राजनीति में हार का सामना करना पड़ा।
लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति नहीं छोड़ी।
1998 में वे एक बार फिर कुंभलगढ़ से विधानसभा पहुंचे। यह उनकी राजनीतिक वापसी थी।
2003 के विधानसभा चुनाव में उन्हें फिर हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बना ली।
इस तरह पंचायत समिति के प्रधान से शुरू हुआ सफर विधायक, मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री तक पहुंचा।
15 दिन की सत्ता, कई दशक की पहचान
हीरालाल देवपुरा के राजनीतिक जीवन को सिर्फ 15 दिन के मुख्यमंत्री कार्यकाल से समझना उनके लंबे सफर को छोटा कर देना होगा।
उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी, जिसने संगठन से लेकर सरकार तक अलग-अलग स्तरों पर जिम्मेदारियां निभाईं।
वकील से राजनेता बने…
पंचायत समिति के प्रधान रहे…
जिला कांग्रेस संगठन संभाला…
विधानसभा पहुंचे…
कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बने…
मुख्यमंत्री बने…
फिर विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली…
और लंबे समय तक राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहे।
राजस्थान विधानसभा के आधिकारिक संग्रह में उनके व्यक्तित्व को सादगी, दृढ़ता और ईमानदारी से जोड़ा गया है। साथ ही उन्हें गांधीवादी विचारों से प्रभावित बताया गया है।
22 दिसंबर 2004 को हुआ निधन
लंबे सार्वजनिक जीवन के बाद हीरालाल देवपुरा का 22 दिसंबर 2004 को निधन हुआ। उनका राजनीतिक जीवन मेवाड़ से शुरू होकर राजस्थान की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा।
उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल की अवधि भले ही बेहद छोटी रही, लेकिन जिस राजनीतिक परिस्थिति में उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली, वह राजस्थान के इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण दौर था।
एक मुख्यमंत्री का इस्तीफा…
भरतपुर के राजा मानसिंह की मौत से पैदा हुआ राजनीतिक तूफान…
चुनावी माहौल…
कांग्रेस आलाकमान का फैसला…
और फिर महज 15 दिन बाद सत्ता परिवर्तन।
इन घटनाओं ने हीरालाल देवपुरा को राजस्थान की राजनीतिक स्मृतियों में एक अलग पहचान दे दी।
निष्कर्ष
हीरालाल देवपुरा की कहानी सिर्फ 15 दिन के मुख्यमंत्री की कहानी नहीं है। यह उस नेता की कहानी है, जिसने मेवाड़ की स्थानीय राजनीति से शुरुआत की, संगठन में अपनी जगह बनाई, सरकार के कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले और अचानक पैदा हुए राजनीतिक संकट के बीच राजस्थान का मुख्यमंत्री बना।
उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भले 15 दिन में चली गई, लेकिन राजनीति में उनकी पहचान दशकों तक कायम रही। शायद यही वजह है कि राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में जब सबसे छोटे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री का जिक्र होता है, तो हीरालाल देवपुरा का नाम आज भी सबसे पहले याद किया जाता है।
