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गर्मी में मटकों की भारी मांग, जानें क्यों ‘देसी फ्रिज’ बन रहे लोगों की पहली पसंद

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

गंगधार, झालावाड़ (सुनील निगम)। गर्मी का मौसम शुरू होते ही झालावाड़ जिले के गंगधार उपखंड क्षेत्र में बनने वाले खास मटकों की मांग तेजी से बढ़ गई है। इन पारंपरिक मटकों को ‘देसी फ्रिज’ भी कहा जाता है, क्योंकि ये भीषण गर्मी में भी पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखते हैं और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माने जाते हैं।

शीतलता और सेहत का अनोखा संगम

गर्मी में ठंडा पानी हर किसी की जरूरत बन जाता है, लेकिन मटके का पानी स्वाद और ठंडक दोनों में खास होता है। गंगधार क्षेत्र के मटकों की विशेषता यह है कि इनमें रखा पानी लंबे समय तक शीतल बना रहता है। यही कारण है कि कई लोग फ्रिज का पानी छोड़कर मटके का पानी पीना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हैं कुम्हार

तेजी से घूमते चाक पर कुम्हारों के हाथों की कला मिट्टी को सुंदर और उपयोगी मटकों में बदल देती है। यह केवल शिल्प नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उदाहरण है। गर्मी शुरू होते ही कुम्हारों का काम भी तेज हो जाता है और सर्दियों में ही मटकों की तैयारी शुरू कर दी जाती है।

दूर-दूर तक होती है सप्लाई

गंगधार के मटके स्थानीय बाजार ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के इलाकों में भी भेजे जाते हैं। इनकी खासियत यह है कि एक बार खरीदने के बाद लंबे समय तक इन्हें बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। यहां के मटकों की लोकप्रियता इतनी है कि बाहर के लोग भी इन्हें खरीदने पहुंचते हैं।

ऐसे बनता है एक मटका

मटका बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत भरी होती है। कुम्हार जंगल से मिट्टी लाकर उसे साफ करते हैं, फिर उसे गलाकर मुलायम बनाया जाता है। इसके बाद चाक पर मटका तैयार किया जाता है। एक कुम्हार करीब तीन दिन में 10 मटके बना पाता है।
मटकों को पहले अंदर सुखाया जाता है, ताकि वे फटें नहीं। सूखने के बाद उन पर रंग किया जाता है और फिर लकड़ी-कंडों की आग में पकाकर उन्हें मजबूत बनाया जाता है।

क्यों बेहतर है मटके का पानी?

मटके का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है और इसमें मौजूद मिट्टी के गुण शरीर को ठंडक देने के साथ जरूरी मिनरल्स भी प्रदान करते हैं। यही वजह है कि गर्मियों में मटके का पानी स्वास्थ्य के लिए फ्रिज के पानी से बेहतर माना जाता है।

गर्मी बढ़ने के साथ ही गंगधार क्षेत्र में मटकों की बिक्री भी लगातार बढ़ रही है और पारंपरिक कारीगरों के चेहरे पर भी रौनक लौट आई है।

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