लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
चार दशक में बदला खेती और खान-पान का चलन, गेहूं से डेढ़ गुना तक पहुंची ज्वार की कीमत
सुनील निगम |
गंगधार, झालावाड़।
एक समय था, जब ज्वार का आटा गेहूं के आटे से आधी कीमत पर मिलता था। ज्वार की रोटी ग्रामीण परिवारों की थाली का अहम हिस्सा हुआ करती थी। लेकिन बदलते कृषि चक्र और खान-पान की आदतों ने इस मोटे अनाज को धीरे-धीरे लोगों की थाली और खेतों से दूर कर दिया है। झालावाड़ जिले के गंगधार क्षेत्र में ज्वार की खेती लगातार सिमट रही है। कभी असिंचित क्षेत्रों की प्रमुख फसल रही ज्वार अब यहां मुश्किल से नजर आती है।
करीब चार दशक पहले तक गांवों में ज्वार की रोटी आसानी से उपलब्ध थी। लोग इसे बड़े चाव से खाते थे, लेकिन अब ज्वार के शौकीनों को भी इसे तलाशना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर इसकी कीमत गेहूं से डेढ़ गुना तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। कभी सस्ता और सहज उपलब्ध रहने वाला यह अनाज अब धीरे-धीरे दुर्लभ होता जा रहा है।
दलहन और तिलहन की ओर बढ़ा किसानों का रुझान
खेती के बदलते तौर-तरीकों के बीच किसानों ने ज्वार से दूरी बनाकर मसूर, चना, गेहूं, मटर, मूंगफली, मूंग, उड़द और सोयाबीन जैसी फसलों की ओर रुख किया है। नतीजतन, क्षेत्र में ज्वार का रकबा और उसकी उपलब्धता घटती जा रही है। कभी कम पानी वाले क्षेत्रों में प्रमुखता से बोई जाने वाली ज्वार और मक्का जैसी फसलें अब पहले की तरह दिखाई नहीं देतीं।
ज्वार से जुड़ी थी गांवों की परंपरा
ज्वार केवल भोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और परंपराओं का भी हिस्सा थी। नई फसल आने पर लोग गाड़ा और गुड़ का सेवन करते थे। घरों में ज्वार की रोटी और उससे बने पारंपरिक व्यंजन बड़े चाव से खाए जाते थे। इसके डंठल और हरे चारे का इस्तेमाल पशुओं के लिए भी किया जाता था। ग्रामीण संस्कृति में ज्वार को मातृस्वरूप मानकर सम्मान देने की परंपरा भी रही है।
बदलते दौर में पीछे छूटता मोटा अनाज
ज्वार की घटती खेती केवल एक फसल का कम होना नहीं, बल्कि ग्रामीण खान-पान और कृषि परंपराओं में आए बदलाव की कहानी भी है। बाजार की मांग, फसलों के चुनाव और बदलती जीवनशैली के बीच कभी आम लोगों की थाली में प्रमुख स्थान रखने वाली ज्वार अब खास शौक का अनाज बनती जा रही है। सवाल यह है कि परंपरागत मोटे अनाज की खेती को फिर से बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की दिशा में कितने प्रयास किए जाएंगे।