लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
अगले बरस नहीं, तुरंत फल-फूल बनकर आएंगे लंबोदर; गोबर, मिट्टी और औषधीय बीजों से बनी थी गणपति प्रतिमा
जयपुर। गणपति बप्पा मोरया के जयकारों और ढोल की थाप के बीच शुक्रवार को टोंक रोड सांगानेर स्थित श्री पिंजरापोल गौशाला के वैदिक औषधीय पादप केंद्र, सनराइज ऑर्गेनिक पार्क में धन्वंतरि गणपति का अनूठे तरीके से विसर्जन किया गया। इस विसर्जन को पर्यावरण संरक्षण और औषधीय पौधों के संवर्धन से जोड़ा गया, जिससे गणपति की प्रतिमा विसर्जन के बाद भी प्रकृति में जीवंत रहेगी।
धन्वंतरि गणपति की प्रतिमा गौमाता के गोबर, उपजाऊ मिट्टी तथा तुलसी, शतावरी, पीकेएम मोरिंगा और नागौरी अश्वगंधा सहित विभिन्न औषधीय बीजों से तैयार की गई थी। विसर्जन से पहले अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता और हैनीमैन एनिमल चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता ने विधि-विधान से गणपति का पूजन किया।
पूजन के बाद गणपति की प्रतिमा को जयकारों के साथ शोभायात्रा के रूप में विसर्जन स्थल तक ले जाया गया। बड़ी संख्या में गौसेवक, वेदपाठी बटुक और श्रद्धालु इसमें शामिल हुए। ढोल की थाप पर श्रद्धालु नाचते हुए आगे बढ़े और ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो गया।
अस्थायी तालाब में हुआ विसर्जन
विसर्जन स्थल पर जमीन में बनाए गए अस्थायी तालाब में धन्वंतरि गणपति की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। श्रद्धालुओं ने पुष्प अर्पित कर गणपति को भावपूर्ण विदाई दी। खास बात यह रही कि प्रतिमा के विसर्जन से प्राप्त मिट्टी मिले जल को सामान्य जलस्रोत में प्रवाहित करने के बजाय औषधीय पौधों की जड़ों तक पहुंचाया गया।
डॉ. अतुल गुप्ता और मोनिका गुप्ता ने बताया कि प्रतिमा की मिट्टी मिले जल को केंद्र में लगे 3 हजार से अधिक औषधीय पौधों की जड़ों में समाहित किया गया। इस तरह प्रतिमा में शामिल मिट्टी और औषधीय बीज प्रकृति के चक्र में वापस शामिल होंगे और पौधों के रूप में नया जीवन पाएंगे।

विसर्जन के बाद भी प्रकृति में रहेंगे गणपति
मोनिका गुप्ता ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य गणेश विसर्जन को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना है। जिस प्रतिमा को श्रद्धा के साथ विदाई दी गई, उसकी मिट्टी अब औषधीय पौधों के संवर्धन में उपयोग होगी। इन पौधों के माध्यम से गणपति की स्मृति प्रकृति में बनी रहेगी और लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मिलेगा।
आयोजकों के अनुसार, इस पहल के माध्यम से धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है, ताकि विसर्जन के बाद भी प्रतिमा प्रकृति के लिए उपयोगी साबित हो।
कार्यक्रम में समाजसेवी मुकेश भारद्वाज, मधुसूदन दाधीच, ए.के. जैन और वी.डी. तिवाड़ी सहित अनेक गौसेवक एवं श्रद्धालु मौजूद रहे।