लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
रितू मेहरा
हर साल आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। शरद पूर्णिमा को ‘क्वार्टर मून’ का पर्व भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूर्णिमा आश्विन माह में आती है और रात को चंद्रमा की रोशनी पूरी धरती पर बिखरी रहती है।
शरद पूर्णिमा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों में विशेष शक्ति होती है। इसे ‘कृष्णचंद्र’ या ‘रासलीला की रात’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा की शीतल किरणें मानव शरीर के लिए औषधि के समान प्रभाव डालती हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं। इस दिन रातभर जागरण और भजन-कीर्तन करना विशेष फलदायक माना जाता है।
खीर बनाने और खाने का महत्व:
शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाना और चांद की रोशनी में उसे रखना एक प्राचीन परंपरा है। कहते हैं कि इस दिन बनाई गई खीर, जिसे ‘चंद्रकांति खीर’ भी कहा जाता है, स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों के लिए लाभकारी होती है। इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही कारण बताए जाते हैं:
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धार्मिक मान्यता:
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शरद पूर्णिमा की खीर भगवान कृष्ण और राधा के प्रिय व्यंजन मानी जाती है।
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इसे चांद की किरणों में रखकर परोसा जाता है, जिससे माना जाता है कि इसमें दिव्य शक्ति समाहित होती है।
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स्वास्थ्य लाभ:
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खीर में दूध, चावल और सूखे मेवे होते हैं, जो शरीर को ऊर्जा और पोषण प्रदान करते हैं।
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शरद पूर्णिमा की ठंडी और शीतल रात में खीर खाने से शरीर ठंडा रहता है और स्वास्थ्य बेहतर होता है।
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समाज में परंपरा:
गांवों और शहरों में लोग इस दिन विशेष भजन-संध्या और जागरण करते हैं। मंदिरों में खीर का भोग लगाया जाता है और परिवार के सभी सदस्य इसे साथ में खाते हैं। इसे भाईचारे, समृद्धि और शुभकामनाओं का प्रतीक भी माना जाता है।
विशेष टिप:
इस दिन यदि खीर बनाते समय चांद की रोशनी में इसे कुछ समय रखा जाए, तो मान्यता है कि यह स्वास्थ्य और मानसिक शांति दोनों के लिए लाभकारी होती है।
इस शरद पूर्णिमा पर अपने घर में खीर बनाकर इसे चांद की रोशनी में रखें और परंपरा के अनुसार आनंद लें। यह सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव का भी प्रतीक है।
