“श्रद्धा और संस्कारों का पालन करें, कर्ज़ और कुरीति का नहीं”
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय समाज में मृत्यु भोज (या तेरहवीं, पगड़ी रस्म, ब्राह्मण भोज) एक ऐसी परंपरा बन चुकी है, जो मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के नाम पर आयोजित की जाती है। किंतु यह परंपरा कब एक सामाजिक कर्तव्य से हटकर एक भारी बोझ बन गई, विशेषकर निर्धन वर्ग के लिए, इसका आत्ममंथन आवश्यक है।
वैदिक दृष्टिकोण:
वेद, विशेषकर ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में मृतक संस्कारों के संबंध में अनेक उल्लेख मिलते हैं, लेकिन कहीं भी मृत्यु भोज की वर्तमान प्रचलित परंपरा का समर्थन नहीं मिलता।
1. श्राद्ध या पिंडदान की विधि – आत्मा की शांति का मार्ग: “पितृन् यमाय पतये नमो अस्तु मृत्यवे”
(यजुर्वेद 40.3)
अर्थ: पितरों और यमराज को हमारा नमस्कार हो, जो मृत्यु के स्वामी हैं।
यह मंत्र केवल श्रद्धा और मानसिक समर्पण की बात करता है, न कि दिखावे और खर्चीली रस्मों की।
2. अन्नदान का महत्व है, प्रदर्शन का नहीं:
“अन्नं बहु कुर्वीत”
(तैत्तिरीय उपनिषद् 3.10)
अर्थ: अन्न का संचय करो, दान दो – लेकिन दिखावे के लिए नहीं, ज़रूरतमंदों के लिए।
वेद अन्नदान को पुण्य कहते हैं, लेकिन वे कभी यह नहीं कहते कि सैकड़ों लोगों को भोज देकर मृतक की आत्मा को तृप्त करो।
मृत्यु भोज: परंपरा से कुरीति तक
आज के समय में मृत्यु भोज एक सामाजिक दबाव और दिखावे की दौड़ बन चुका है। विशेषकर निम्नवर्गीय और निर्धन परिवारों के लिए यह एक अत्यंत पीड़ादायक रस्म है: जो परिवार पूरे जीवन जैसे-तैसे गुज़ारा करता है, वह कर्ज़ लेकर मृत्यु भोज करता है। अक्सर देखा गया है कि अंतिम संस्कार के तुरंत बाद परिजनों को भोज की चिंता सताने लगती है।
समाज का भय, “लोग क्या कहेंगे”, इस रस्म को ढोता रहता है।
गरीबों के लिए सामाजिक मुक्ति की आवश्यकता:
1. आर्थिक दृष्टिकोण से बोझ:
गरीब व्यक्ति को यदि 200-500 लोगों को भोजन कराना है, तो उसे अपने जेवर,जमीन,घर तक गिरवी रखना पड़ता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, बच्चों के भविष्य की बचत मृत्यु भोज की भेंट चढ़ जाती है।
2. आत्मिक दृष्टिकोण से पीड़ा:
जब व्यक्ति का प्रियजन जाता है, उस समय शांति और ध्यान की ज़रूरत होती है, न कि व्यर्थ की तैयारी और समाज के ताने।
वेदों के आलोक में समाधान:
1. श्रद्धा से की गई प्रार्थना ही पर्याप्त है:
> “श्रद्धया देयम्”
(तैत्तिरीय उपनिषद् 1.11)
अर्थ: जो कुछ भी दान करो, श्रद्धा से करो – न दिखावे से, न भय से।
2. पितरों की तृप्ति सेवा से होती है, भोज से नहीं:
“श्रद्धया शान्तिमाप्नुयात्”
(छान्दोग्य उपनिषद् 7.22)
अर्थ: श्रद्धा से ही आत्मा को शांति मिलती है।
सामाजिक अपील:
आज ज़रूरत है कि हम मृत्यु भोज को निजता और श्रद्धा का विषय मानें, न कि दिखावे और मजबूरी का माध्यम। खासकर गरीब वर्ग को इस कुरीति से मुक्ति दिलाने के लिए समाज को जागरूक होना चाहिए। पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलें समाज के बुद्धिजीवी लोग इसका विरोध करें आर्थिक सहायता की बजाय भावनात्मक सहयोग को महत्व मिले
मृत्यु भोज का उद्देश्य यदि आत्मा की शांति है, तो वह साधना, सेवा और श्रद्धा से संभव है – न कि दावत, भीड़ और व्यर्थ के प्रदर्शन से। वेदों की शिक्षाएं स्पष्ट हैं – सादगी और सार्थकता ही असली श्रद्धांजलि है।
“श्रद्धा और संस्कारों का पालन करें, कर्ज़ और कुरीति का नहीं”
