लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
“कानून से ऊपर कोई नहीं
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“जब न्याय की जड़ें गहरी होती हैं, तब सत्ता के सबसे ऊंचे वृक्ष भी हिल जाते हैं।”
दशकों से भारत की जनता ने अरबपतियों को एक ऐसे क्षेत्र में चलते देखा है, जहाँ कानून की पहुँच सीमित लगती थी—ना तो कानून छूता था, ना घोटाले उन्हें झुका पाते थे। मगर ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) द्वारा अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप पर ₹3,000 करोड़ के बैंक घोटाले के तहत की गई छापेमारी उस चुप्पी के युग से बाहर आने का एक निर्णायक संकेत है।
स्वतंत्रता के बाद से, भारत के औद्योगिक अभिजात वर्ग में—विशेष रूप से ‘अंबानी’ जैसे नामों वाले—बहुत कम लोग ऐसे रहे हैं जो गंभीर कानूनी कार्रवाई की जद में आए हों। यह सिर्फ एक और वित्तीय जांच नहीं है। यह एक सशक्त संदेश है।
शक्तिशाली लोगों के लिए एक संदेश
भारत के सबसे हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट समूहों में से एक पर छापा मारकर ईडी ने वह कर दिखाया जो कभी अकल्पनीय माना जाता था। इसने उन ‘छूट’ की चादरों को चीर दिया है जो वर्षों से टाइकून जैसे लोगों पर फैली थीं।
यह संदेश साफ़ है—न दौलत, न उपनाम, न विरासत… कोई भी आपको कानूनी जांच से नहीं बचा सकता।
यह केवल एक आर्थिक कार्रवाई नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के मनोविज्ञान में बदलाव की शुरुआत है।
जहाँ पहले माना जाता था कि “बड़े मछलियाँ बच निकलती हैं”, अब एक नई धारणा जन्म ले रही है—साहसी न्याय, न कि अंधभक्ति।
उदारीकरण के बाद का आत्मावलोकन?
भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों को जन्म दिया, लेकिन इन टावरों की नींव अक्सर कर्ज़, राजनीतिक संरक्षण और विनियामक धुंध पर आधारित रही। सुधार हुए, मगर नैतिक उद्यमिता का विकास नहीं हुआ।
2025 में अनिल अंबानी पर कार्रवाई, एक पाठ-संशोधन के रूप में देखी जा सकती है—जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन और आपराधिक जवाबदेही की आवश्यकता को स्वीकार किया जा रहा है।
ईडी की रीढ़ मज़बूत या चुनावी मांसपेशी?
जहाँ यह कार्रवाई सराहनीय है, वहीं यह सवाल भी उठता है—क्या यह सफाई की एक स्थायी प्रक्रिया की शुरुआत है या बस एक सुर्खियों वाली कार्रवाई?
कानून की साख सिर्फ एक घटना में नहीं, बल्कि उसके समान अनुप्रयोग में निहित होती है।
क्या हम अन्य राजनैतिक या कॉरपोरेट घरानों पर भी ऐसी ही निडर कार्रवाई देखेंगे?
यही असली परीक्षा होगी।
सुधार की दिशा में कदम
यह कार्रवाई यदि महज़ तमाशा बन कर रह जाए, तो यह अवसर चूक जाएगा। भारत को चाहिए:
बैंकों और वित्तीय संस्थानों में पारदर्शी लोन डिस्क्लोज़र सिस्टम
उच्च-मूल्य के आर्थिक अपराधों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट
SEBI, RBI, ED जैसी संस्थाओं की स्वतंत्र निगरानी
व्हिसल ब्लोअर्स के लिए संरक्षण
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन1991 कॉरपोरेट समूहों के निवेशक और कर्मचारी कानूनी कार्रवाई की कीमत न चुकाएँ—जबकि वास्तविक दोषियों को उनके पद या पहचान की परवाह किए बिना पूर्ण न्यायिक दंड मिले।
एक नया भय-वारिस
कहा जाता है—गरीब पुलिस से डरता है, मध्यवर्ग टैक्स वाले से, लेकिन अमीर किसी से नहीं।
अगर ईडी की यह कार्रवाई एक “टेम्पलेट” बन जाए, महज़ अपवाद न रहे,
तो शायद यह कहावत पुनः लिखी जा सकेगी।
यह हर उस ईमानदार अधिकारी, पत्रकार और नागरिक के लिए प्रेरणा है जो व्यवस्था के विशेषाधिकारों पर सवाल उठाने का साहस रखते हैं।
यह कॉरपोरेट कुलीन वर्ग को याद दिलाता है कि लोकतंत्र कोई बोर्डरूम नहीं, और न्याय पर वोट नहीं किया जा सकता।
आज सरकार ने स्पष्ट कर दिया है न्याय से ऊपर कोई नहीं।
कानून ने अपनी आवाज़ फिर से पा ली है।
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी
“जब न्याय की जड़ें गहरी होती हैं, तब सत्ता के सबसे ऊंचे वृक्ष भी हिल जाते हैं।”
दशकों से भारत की जनता ने अरबपतियों को एक ऐसे क्षेत्र में चलते देखा है, जहाँ कानून की पहुँच सीमित लगती थी—ना तो कानून छूता था, ना घोटाले उन्हें झुका पाते थे। मगर ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) द्वारा अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप पर ₹3,000 करोड़ के बैंक घोटाले के तहत की गई छापेमारी उस चुप्पी के युग से बाहर आने का एक निर्णायक संकेत है।
स्वतंत्रता के बाद से, भारत के औद्योगिक अभिजात वर्ग में—विशेष रूप से ‘अंबानी’ जैसे नामों वाले—बहुत कम लोग ऐसे रहे हैं जो गंभीर कानूनी कार्रवाई की जद में आए हों। यह सिर्फ एक और वित्तीय जांच नहीं है। यह एक सशक्त संदेश है।
शक्तिशाली लोगों के लिए एक संदेश
भारत के सबसे हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट समूहों में से एक पर छापा मारकर ईडी ने वह कर दिखाया जो कभी अकल्पनीय माना जाता था। इसने उन ‘छूट’ की चादरों को चीर दिया है जो वर्षों से टाइकून जैसे लोगों पर फैली थीं।
यह संदेश साफ़ है—न दौलत, न उपनाम, न विरासत… कोई भी आपको कानूनी जांच से नहीं बचा सकता।
यह केवल एक आर्थिक कार्रवाई नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के मनोविज्ञान में बदलाव की शुरुआत है।
जहाँ पहले माना जाता था कि “बड़े मछलियाँ बच निकलती हैं”, अब एक नई धारणा जन्म ले रही है—साहसी न्याय, न कि अंधभक्ति।
उदारीकरण के बाद का आत्मावलोकन?
भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों को जन्म दिया, लेकिन इन टावरों की नींव अक्सर कर्ज़, राजनीतिक संरक्षण और विनियामक धुंध पर आधारित रही। सुधार हुए, मगर नैतिक उद्यमिता का विकास नहीं हुआ।
2025 में अनिल अंबानी पर कार्रवाई, एक पाठ-संशोधन के रूप में देखी जा सकती है—जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन और आपराधिक जवाबदेही की आवश्यकता को स्वीकार किया जा रहा है।
ईडी की रीढ़ मज़बूत या चुनावी मांसपेशी?
जहाँ यह कार्रवाई सराहनीय है, वहीं यह सवाल भी उठता है—क्या यह सफाई की एक स्थायी प्रक्रिया की शुरुआत है या बस एक सुर्खियों वाली कार्रवाई?
कानून की साख सिर्फ एक घटना में नहीं, बल्कि उसके समान अनुप्रयोग में निहित होती है।
क्या हम अन्य राजनैतिक या कॉरपोरेट गुटों पर भी ऐसी ही निडर कार्रवाई देखेंगे?
यही असली परीक्षा होगी।
सुधार की दिशा में कदम
यह कार्रवाई यदि महज़ तमाशा बन कर रह जाए, तो यह अवसर चूक जाएगा। भारत को चाहिए:
बैंकों और वित्तीय संस्थानों में पारदर्शी लोन डिस्क्लोज़र सिस्टम
उच्च-मूल्य के आर्थिक अपराधों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट
SEBI, RBI, ED जैसी संस्थाओं की स्वतंत्र निगरानी
व्हिसल ब्लोअर्स के लिए संरक्षण
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन1991 कॉरपोरेट समूहों के निवेशक और कर्मचारी कानूनी कार्रवाई की कीमत न चुकाएँ—जबकि वास्तविक दोषियों को उनके पद या पहचान की परवाह किए बिना पूर्ण न्यायिक दंड मिले।
एक नया भय-वारिस
कहा जाता है—गरीब पुलिस से डरता है, मध्यवर्ग टैक्स वाले से, लेकिन अमीर किसी से नहीं।
अगर ईडी की यह कार्रवाई एक “टेम्पलेट” बन जाए, महज़ अपवाद न रहे,
तो शायद यह कहावत पुनः लिखी जा सकेगी।
यह हर उस ईमानदार अधिकारी, पत्रकार और नागरिक के लिए प्रेरणा है जो व्यवस्था के विशेषाधिकारों पर सवाल उठाने का साहस रखते हैं।
यह कॉरपोरेट कुलीन वर्ग को याद दिलाता है कि लोकतंत्र कोई बोर्डरूम नहीं, और न्याय पर वोट नहीं किया जा सकता।
आज सरकार ने स्पष्ट कर दिया है न्याय से ऊपर कोई नहीं।
कानून ने अपनी आवाज़ फिर से पा ली है।