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श्रवण कुमार छह बार विधायक, दिग्गजों को हराया… फिर भी मंत्री पद से क्यों रहे दूर?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

गांव के सरपंच से विधानसभा तक पहुंचे श्रवण कुमार ने पिलानी और सूरजगढ़ में बनाई अलग पहचान, बेबाक अंदाज और ठेठ देसी शैली के लिए सदन में अलग मुकाम

नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता

राजस्थान की राजनीति में कुछ नेताओं की पहचान बड़े पदों से होती है, तो कुछ नेता ऐसे भी होते हैं जिनकी सबसे बड़ी ताकत उनका लगातार जनता के बीच बने रहना होती है। झुंझुनूं के श्रवण कुमार इसी दूसरी श्रेणी के नेता हैं। गांव की राजनीति से निकले, सरपंच बने, पंचायत समिति के उपप्रधान रहे और फिर विधानसभा की राजनीति में ऐसा सफर तय किया कि छह बार विधायक निर्वाचित हुए।

दिलचस्प बात यह है कि श्रवण कुमार ने अपने राजनीतिक सफर में कई दिग्गज नेताओं को चुनावी शिकस्त दी, सीट बदली, चुनाव हारे और फिर वापसी भी की। लेकिन छह बार विधायक बनने के बावजूद उनके राजनीतिक खाते में मंत्री पद नहीं जुड़ा।

यही सवाल उनकी राजनीतिक कहानी का सबसे अहम हिस्सा बन जाता है—जिस नेता ने छह बार विधानसभा पहुंचकर अपना जनाधार साबित किया, उसे सरकार में मंत्री बनने का मौका क्यों नहीं मिला?

सरपंची से शुरू हुआ सफर, विधानसभा तक पहुंचा

श्रवण कुमार का जन्म 2 अक्टूबर 1954 को झुंझुनूं जिले की सूरजगढ़ तहसील के घरडू की ढाणी में हुआ। उनके पिता गोकल राम और माता दाना देवी थीं। उन्होंने सूरजगढ़ के बृजलाल हायर सेकेंडरी स्कूल से हायर सेकेंडरी तक शिक्षा हासिल की।

ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े श्रवण कुमार की राजनीति की शुरुआत भी गांव से ही हुई।

1981 में वे ग्राम पंचायत जीणी के सरपंच निर्वाचित हुए। इसके बाद 1988 में पंचायत समिति सूरजगढ़ के उपप्रधान बने। स्थानीय राजनीति में सक्रियता बढ़ती गई और आखिरकार विधानसभा चुनाव का रास्ता खुला।

कांग्रेस से टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय मैदान में उतरे

1993 का विधानसभा चुनाव श्रवण कुमार के राजनीतिक जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।

कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पिलानी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। मुकाबला आसान नहीं था। सामने कांग्रेस की दिग्गज नेता सुमित्रा सिंह थीं।

लेकिन श्रवण कुमार ने चुनाव जीतकर राजनीतिक हलकों को चौंका दिया।

एक गांव से निकलकर आए निर्दलीय उम्मीदवार ने कांग्रेस की स्थापित नेता को हरा दिया और विधानसभा पहुंच गए।

यहीं से श्रवण कुमार की उस राजनीतिक शैली की शुरुआत हुई, जिसमें पार्टी से ज्यादा अपना क्षेत्रीय जनाधार महत्वपूर्ण दिखाई देता है।

पिलानी में लगातार तीन जीत

1993 के बाद श्रवण कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1998 में कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने पिलानी से चुनाव जीता। इस चुनाव में उन्होंने निर्दलीय राजेंद्र भालोथिया को हराया। श्रवण कुमार को 54,565 वोट मिले, जबकि राजेंद्र भालोथिया को 29,063 वोट मिले। जीत का अंतर 25,502 वोट रहा।

2003 में भी श्रवण कुमार ने पिलानी से जीत दर्ज की। इस बार मुकाबला भाजपा के डॉ. मूल सिंह शेखावत से था। श्रवण कुमार को 53,367 वोट मिले, जबकि डॉ. मूल सिंह शेखावत को 44,453 वोट मिले। जीत का अंतर 8,914 वोट रहा।

इस तरह पिलानी से लगातार तीन बार विधायक बनने के बाद श्रवण कुमार की राजनीतिक पकड़ मजबूत हो चुकी थी।

लेकिन इसके बाद चुनावी भूगोल बदल गया।

पिलानी विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई और श्रवण कुमार को अपनी राजनीतिक जमीन बदलनी पड़ी।

पिलानी से सूरजगढ़… सीट बदली, सियासी संघर्ष नहीं

2008 में श्रवण कुमार ने सूरजगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।

लेकिन 2013 का चुनाव उनके लिए झटका लेकर आया। उन्हें भाजपा की संतोष अहलावत से हार का सामना करना पड़ा।

संतोष अहलावत बाद में झुंझुनूं से सांसद बनीं।

इसके बाद सूरजगढ़ सीट पर उपचुनाव हुआ और 2014 में श्रवण कुमार ने एक बार फिर वापसी की। इस बार उन्होंने भाजपा के डॉ. दिगंबर सिंह को हराकर विधानसभा में वापसी की।

2018 में भाजपा के सुभाष पूनिया ने उन्हें चुनाव में पराजित किया।

लेकिन श्रवण कुमार का चुनावी सफर यहीं खत्म नहीं हुआ।

2023 में उन्होंने फिर सूरजगढ़ से जीत दर्ज की और विधानसभा में वापसी की।

यानी छह बार विधायक बनने की उनकी यात्रा में सिर्फ जीत का सिलसिला नहीं है, बल्कि हार के बाद वापसी की कहानी भी है।

छह बार विधायक… फिर भी मंत्री पद क्यों नहीं?

श्रवण कुमार की राजनीतिक कहानी का सबसे चर्चित पहलू यही है।

वे छह बार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते, निर्दलीय जीत दर्ज की, पिलानी से सूरजगढ़ तक अपनी राजनीतिक जमीन बनाई और हार के बाद वापसी भी की।

लेकिन मंत्री पद उनसे लगातार दूर रहा।

राजस्थान की राजनीति में यह सवाल लंबे समय से चर्चा का विषय रहा कि इतने लंबे विधानसभा अनुभव के बावजूद श्रवण कुमार को किसी सरकार में मंत्री पद क्यों नहीं मिला।

खास बात यह भी रही कि उनसे बाद में राजनीति में आए कई नेताओं को सरकार में मंत्री बनने का अवसर मिला।

यही वजह है कि श्रवण कुमार की नाराजगी कई मौकों पर उनके बयानों और सदन में उनके अंदाज में दिखाई देती रही।

हालांकि मंत्री पद किसी विधायक का स्वतः मिलने वाला अधिकार नहीं होता। मंत्रिमंडल का गठन राजनीतिक नेतृत्व के निर्णय, क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व तथा अन्य राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करता है। फिर भी छह बार के विधायक को मंत्री पद नहीं मिलने का सवाल उनकी राजनीतिक प्रोफाइल का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा।

ठेठ गांव का नेता, लेकिन अंदाज पूरा स्टाइलिश

श्रवण कुमार की पहचान सिर्फ उनके चुनावी रिकॉर्ड से नहीं है।

उनकी शैली भी उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती है।

गांव की मिट्टी से निकले श्रवण कुमार का अंदाज ठेठ देसी है, लेकिन पहनावे और प्रस्तुति में वे काफी स्टाइलिश नजर आते हैं। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी सक्रियता और अपने समर्थकों के मुद्दे उठाने की शैली उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा रही है।

वे अक्सर कार्यकर्ताओं की समस्याओं को लेकर मुखर दिखाई देते हैं।

यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें ऐसा नेता मानते हैं जो सत्ता और संगठन के भीतर भी अपनी बात खुलकर रखने से पीछे नहीं हटता।

अपनी ही सरकार को घेरने से भी नहीं चूके

श्रवण कुमार की राजनीति का एक और खास पहलू उनका बेबाक अंदाज है।

विधानसभा में वे कई बार अपनी ही पार्टी की सरकार को भी सवालों के घेरे में लेते रहे हैं। अधिकारियों से लेकर विभागीय कामकाज तक और कार्यकर्ताओं की अनदेखी से लेकर क्षेत्रीय समस्याओं तक—वे अपनी बात सीधे अंदाज में रखने के लिए जाने जाते हैं।

उनका मानना रहा कि विधायक की भूमिका सिर्फ सरकार का समर्थन करना नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओं की आवाज सदन में उठाना भी है।

यही वजह है कि उनके भाषणों में कई बार सरकार के प्रति सवाल भी होते हैं और विपक्ष पर राजनीतिक हमला भी।

विपक्ष पर वार… और सदन में हंसी का फव्वारा

श्रवण कुमार की विधानसभा शैली को समझने के लिए उनके बोलने के अंदाज को देखना जरूरी है।

वे लंबे-चौड़े राजनीतिक भाषणों की बजाय किस्सों, उदाहरणों और ग्रामीण भाषा-शैली के जरिए अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं।

कई बार विपक्ष पर निशाना साधते हुए उनकी भाषा में ऐसा देसी तड़का होता है कि राजनीतिक वार के साथ सदन में हंसी का माहौल भी बन जाता है।

वे सत्ता पक्ष पर भी कटाक्ष कर देते हैं और विपक्ष को भी नहीं छोड़ते।

उनकी वाकपटुता का असर यही है कि गंभीर राजनीतिक मुद्दे पर बोलते-बोलते वे ऐसा उदाहरण या किस्सा जोड़ देते हैं कि सदन का माहौल कुछ पल के लिए हल्का हो जाता है।

यही उनका राजनीतिक अंदाज है—बात भी सीधी, तंज भी सीधा और भाषा ऐसी कि बात याद रह जाए।

2019 में लोकसभा चुनाव और एक बड़ी हार

विधानसभा में अपनी मजबूत पकड़ के बावजूद श्रवण कुमार को लोकसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली।

2019 में कांग्रेस ने उन्हें झुंझुनूं लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। उनका मुकाबला भाजपा के नरेंद्र खींचड़ से हुआ, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

इस चुनाव को लेकर स्थानीय राजनीतिक हलकों में अलग-अलग चर्चाएं भी हुईं। इनमें शीशराम ओला परिवार से कथित राजनीतिक नाराजगी की चर्चा भी शामिल रही। हालांकि ऐसी राजनीतिक व्याख्याओं को स्थापित तथ्य की तरह नहीं देखा जा सकता।

इतना जरूर है कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी श्रवण कुमार की विधानसभा राजनीति पर इसका स्थायी असर नहीं पड़ा और उन्होंने आगे फिर सूरजगढ़ से अपनी राजनीतिक वापसी की।

कार्यकर्ताओं की आवाज बनने की कोशिश

श्रवण कुमार की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा कार्यकर्ताओं के इर्द-गिर्द रहा है।

वे कई बार यह कहते रहे कि संगठन में जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को सम्मान और महत्व मिलना चाहिए।

मंत्री पद को लेकर उनकी नाराजगी भी इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में सामने आती रही। छह बार विधायक बनने के बावजूद मंत्री पद से दूर रहने का दर्द उनके बयानों में कई बार दिखाई दिया।

उन्होंने झुंझुनूं जिले से जुड़े नेताओं और सरकार के कामकाज पर भी तंज कसे। डॉ. जितेंद्र सिंह और विधायक डॉ. राजकुमार को लेकर उन्होंने सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री को दी जा रही सलाह पर कटाक्ष किया था।

उनकी शैली में नाराजगी भी होती है और व्यंग्य भी।

छह चुनावी जीत की कहानी से आगे भी बहुत कुछ

श्रवण कुमार की राजनीतिक यात्रा को सिर्फ छह बार विधायक बनने के आंकड़े में समेटना उनके पूरे राजनीतिक चरित्र को समझना नहीं होगा।

उनकी कहानी में गांव की सरपंची है।

पंचायत समिति की राजनीति है।

कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला है।

दिग्गज नेता को हराकर विधानसभा पहुंचने की कहानी है।

लगातार तीन बार पिलानी से जीत है।

सीट आरक्षित होने के बाद राजनीतिक जमीन बदलने की मजबूरी है।

सूरजगढ़ से जीत और हार है।

उपचुनाव में वापसी है।

फिर हार है।

और उसके बाद 2023 में एक बार फिर विधानसभा पहुंचने की कहानी है।

और इन सबके बीच एक सवाल लगातार बना रहा—छह बार विधायक बनने के बावजूद श्रवण कुमार को मंत्री पद क्यों नहीं मिला?

इस सवाल का अंतिम जवाब राजनीतिक नेतृत्व और उस समय के राजनीतिक समीकरणों में ही तलाशा जा सकता है। लेकिन इतना साफ है कि मंत्री पद न मिलने के बावजूद श्रवण कुमार ने विधानसभा की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

वे उन नेताओं में हैं जिनकी ताकत किसी बड़े सरकारी पद से ज्यादा उनके क्षेत्रीय जनाधार, कार्यकर्ताओं से जुड़ाव और सदन में बेबाक बोलने की शैली रही है।

गांव से निकला यह नेता छह बार विधानसभा पहुंचा। दिग्गजों को हराया। हार के बाद वापसी की। अपनी ही पार्टी को भी आईना दिखाया और विपक्ष पर भी देसी अंदाज में वार किया।

यही श्रवण कुमार की सियासी कहानी है—सरपंची से विधानसभा तक का सफर, छह चुनावी जीत और मंत्री पद से लगातार दूरी।

 

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