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‘बहरों को जगाने के लिए धमाके की जरूरत नहीं’-रविंद्र भाटी

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 EWS आरक्षण के सरलीकरण की मांग को लेकर की यात्रा

जयपुर/बाड़मेर। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS आरक्षण के नियमों में सरलीकरण की मांग को लेकर शिव से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी प्रदेशव्यापी यात्रा पर हैं। बाड़मेर से शुरू हुई इस मुहिम में भाटी केंद्र और राज्य के EWS नियमों में एकरूपता, प्रमाण-पत्र की मान्यता, जमीन और आय से जुड़ी शर्तों में बदलाव समेत कई मांगें उठा रहे हैं।

भाटी का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में ऐसी कई शर्तें हैं, जिनके चलते आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पात्र युवाओं के लिए EWS का लाभ लेना आसान नहीं है। उनका विशेष जोर ग्रामीण क्षेत्रों की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पात्रता के मानकों को व्यावहारिक बनाने पर है।

क्या है भाटी की प्रमुख मांग?

भाटी की मुहिम में सबसे प्रमुख मुद्दा केंद्र और राज्य के EWS नियमों में एकरूपता का है। उनका कहना है कि राज्यों में जारी होने वाले EWS प्रमाण-पत्रों को केंद्रीय सेवाओं और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में भी मान्यता मिलनी चाहिए, ताकि अभ्यर्थियों को अलग-अलग स्तर पर प्रमाण-पत्र और दस्तावेजों की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़े।

केंद्र सरकार की मौजूदा व्यवस्था के अनुसार EWS के लिए आय और संपत्ति प्रमाण-पत्र सक्षम प्राधिकारी से जारी होना जरूरी है। केंद्र सरकार की नौकरियों में EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। मौजूदा केंद्रीय मानकों में परिवार की सकल वार्षिक आय आठ लाख रुपये से कम होने के साथ कुछ संपत्ति संबंधी सीमाएं भी लागू हैं।

जमीन की शर्तों में बदलाव की मांग

भाटी का तर्क है कि केवल जमीन का आकार किसी परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का पूरा पैमाना नहीं हो सकता। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन की उत्पादकता, सिंचाई, स्थानीय बाजार मूल्य और उससे होने वाली आय अलग-अलग हो सकती है।

इसी आधार पर वे EWS पात्रता में जमीन और अचल संपत्ति से जुड़ी शर्तों की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। यात्रा के दौरान अचल संपत्ति की बाध्यता कम करने और आर्थिक स्थिति के आकलन में आय को अधिक महत्व देने की मांग भी सामने आई है।

हालांकि, केंद्रीय EWS व्यवस्था में वर्तमान में भूमि और संपत्ति से जुड़े स्पष्ट मानदंड लागू हैं। इसलिए इन नियमों में बदलाव के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर नीतिगत निर्णय आवश्यक होगा।

EWS प्रमाण-पत्र की वैधता 3 से 5 साल करने की मांग

भाटी की एक प्रमुख मांग EWS प्रमाण-पत्र की वैधता अवधि से जुड़ी है। उनका कहना है कि हर साल प्रमाण-पत्र बनवाने की प्रक्रिया से अभ्यर्थियों को राहत देने के लिए इसकी वैधता तीन से पांच वर्ष तक की जानी चाहिए।

इसके साथ ही साधारण शपथ-पत्र के आधार पर नवीनीकरण जैसी व्यवस्था लागू करने की मांग भी उठाई गई है।

आयु सीमा और आवेदन शुल्क में राहत

भाटी EWS अभ्यर्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में आयु सीमा और आवेदन शुल्क में उचित छूट की मांग भी कर रहे हैं।

उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के लिए केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने की प्रक्रिया को भी उनके लिए सुगम बनाया जाना चाहिए।

विवाहित महिलाओं के दस्तावेजों की जटिलता का मुद्दा

भाटी ने विवाहित महिला अभ्यर्थियों के लिए आय और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग भी रखी है। उनका कहना है कि माता-पिता और ससुराल पक्ष से जुड़े दस्तावेजों की जटिलताओं को स्पष्ट नियमों के जरिए कम किया जाना चाहिए।

इसके अलावा EWS विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, छात्रावास जैसी शैक्षणिक सुविधाएं और पंचायती राज संस्थाओं में प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दे भी भाटी की मांगों में शामिल बताए गए हैं।

सरकार का मौजूदा रुख क्या है?

EWS आरक्षण संविधान के 103वें संशोधन के बाद लागू हुआ और केंद्र सरकार की नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान है।

हालांकि, केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2026 को लोकसभा में बताया था कि मौजूदा EWS आरक्षण प्रावधानों में संशोधन का कोई प्रस्ताव उसके विचाराधीन नहीं है। ऐसे में भाटी द्वारा उठाई जा रही मांगों पर आगे कोई निर्णय होता है या नहीं, यह केंद्र सरकार के नीतिगत रुख पर निर्भर करेगा।

यात्रा से फिर चर्चा में आया EWS मुद्दा

रविंद्र सिंह भाटी की यात्रा ने EWS आरक्षण की पात्रता और प्रमाण-पत्र व्यवस्था को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। भाटी का जोर इस बात पर है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखते हुए नियम सरल और व्यावहारिक बनाए जाएं।

अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इन मांगों पर कोई नीतिगत पहल करती है या मौजूदा EWS व्यवस्था को ही जारी रखती है।

भाटी की मुहिम का संदेश साफ है—आरक्षण का लाभ तभी प्रभावी माना जाएगा, जब पात्र व्यक्ति तक पहुंचने की प्रक्रिया भी सरल हो।

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