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गोनेर जगदीश मंदिर को मुगलों से बचाने के लिए ठाकुर सुजान सिंह ने दिया सर्वोच्च बलिदान

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ढूंढाड़ में मुगलों से भिड़ने वाला एक मात्र “सांभरिया” गांव का पंच्याणोंत राजपूत ठिकाना ही था।


सा.जितेंद्र सिंह शेखावत खच्चरियावा वरिष्ठ पत्रकार

औरंगजेब के शासनकाल में मुगल सेना नायक अबू तराब ने अगस्त 1680 में आमेर राज्य के 66 मंदिर तोड़े थे। इसके खिलाफ पूरे ढूंढाढ़ में केवल कछवाहा सुजान सिंह ने आवाज उठाई थी। कोई अन्य जागीरदार मुगलों का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सका था।
औरंगजेब की सेना जब गोनेर के लक्ष्मी जगदीश मंदिर को ध्वस्त करने के किए आगे बढ़ी तब सामरिया ठिकाने के ठाकुर सुजान सिंह पंच्याणोत के नेतृत्व में राजपूतों और अन्य जातियों के वीरों ने मुगल सेना का मुकाबला किया और प्राणों का बलिदान देकर गोनेर के मंदिर को बचा लिया।
अगस्त 1681 में मुगलों से हुए भीषण युद्ध में ठाकुर सुजान सिंह बेटे किशनदास के साथ अंतिम सांस तक लड़े और अंत में सिर कटा कर उन्होंने अतुलनीय बलिदान दिया था। सुजान सिंह की सैन्य टुकड़ी ने इस युद्ध में करीब तीन सौ मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतारा था। छोटी सी जागीर सामरिया के स्वामी कछवाहा राजपूत ने मंदिर की पवित्रता को बचाने के लिए प्राणों की आहुति देने में कोई संकोच नहीं किया। औरंगजेब के सैनिक मंदिर की देहरी को लांघ नहीं सके और इसके शिखर पर भगवान जगदीश की पताका फहरती रही। आमेर में मंदिरों का विध्वंस और सुजान सिंह के बलिदान को इतिहासकारों ने उजागर ही नहीं किया।


इतिहासकार जदुनाथ सरकार और कविराजा श्यामल दास ने वीर विनोद में लिखा कि मंदिरों को तोड़ने के लिए औरंगजेब 25 सितंबर 1679 को अजमेर पहुंचा था। सेनापति तराब ने आमेर के 66 मंदिरों को तोड़ने की रिपोर्ट 21 अगस्त 1681 को बादशाह को दी थी।
सुजान सिंह का सिर गोनेर के तालाब की पाल पर गिरा था। वहां बनी छतरी को लोग भौमिया जी की छतरी कहते हैं। इसके पास सुजान सिंह के साथ सिर कटवाने वाले नाई यानी खवास जी का चबूतरा है। इतिहासकार देवी सिंह मंडावा ने लिखा है कि आमेर के तत्कालीन नरेश पृथ्वीराज ने पांचवें पुत्र पंचायण को खोरी का जागीरदार बनाया था। बाद में बिट्ठल दास का बेटा उदयसिंह नायला का शासक बना। इनके पुत्र सामरिया के सुजान सिंह ने बेटे किशन दास के साथ गोनेर मंदिर की खातिर अपना बलिदान दिया। उस समय गोनेर भी सुजान सिंह की जागीरी का गांव था।
मुहता नैणसी में लिखा है कि हबीब खां से लड़ते हुए सुजान सिंह काम (वीर गति को प्राप्त) आया था। इस घटना के समय अमर के तत्कालीन नरेश राम सिंह प्रथम को औरंगजेब ने अफगानिस्तान भेज दिया था।

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